Monday, October 17, 2016

साहित्य को जरूरत है, नोबेल-पुरस्कार की


 प्रभु जोशी


               
यह साहित्य के आगत का बहुत दिलचस्च-दृश्य है कि एक कमजोर बौद्धिक-आधार वाले, बावले भारतीय समाज में, उसकी समझ की चकरी, कभी भी और किसी भी दिशा में घूमती रह सकती है। उसका अब कोई दायां-बायां नहीं है, वह अपनी ही प्रदक्षिणा में लगी हुई है। इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि उसकी डोर, अब सोशल-मीडिया के हाथ में है, जो पल-प्रतिपल, करवटें ही बदलता रहता है । बहरहाल, जैसे ही अमेरिकी पॉपुलर गायक, बॉब डायलन को साहित्य के नोबेल पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई, हमारे यहां लगे हाथ ‘देसी बॉब डायलन’ ढूंढे जाने लगे। यहां तक कि कुछेक की तो कब्रें खोद कर, उन्हें माला पहनाने की तैयारी होने लगी तो मंच के कुछ जीवित-महानों को, सोशल मीडिया के घोड़े की पीठ पर बैठा कर, अश्वमेध की ध्वजा पकड़ा कर, संसार भर में चक्कर काटने भेज दिया गया । तीसरे और चौथे दर्जे के तुक्कड़ और गलेबाजों ने तो स्वयं ही कण्ठहार अपने गले में डाल लिया और लगा कि अब गीत के दिन लौट आए हैं। 
हमारे यहां मालवी में एक कहावत है कि ‘बावले को मिल गई ‘बाटकी’ [-कटोरी-] तो उसने पानी पी पी-कर अपना पेट फोड़ लिया। बहरहाल, हर्षातिरेक की एक मनोरंजक पराकाष्ठा दिखने लगी है। नोबेल पुरस्कार की घोषणा, एक गीत गायक के नाम होने से, यहां की साहित्यिक बिरादरी ने, उम्मीद में कटोरी संभाल ली ताकि पुरस्कार की खीर उसमें कब गिर जाए।
यह निर्विवाद रूप से सच है कि बॉब डायलन विकसित राष्ट्र और समाज के एक बहुत लोकप्रिय गायक और गीत लेखक हैं। और पश्चिमी-संगीत में जिनकी थोड़ी बहुत भी रूचि रही है, उनके लिए, यह नाम स्फूर्ति भरता भी है। बेशक उन्होंने खासकर साठ के दशक में वामपंथी रुझान के और कई युद्ध विरोधी गीत लिखे-और-गाये हैं , जो अत्यधिक सराहे और पसन्द भी किये गये। मैं , जब आकाशवाणी में ‘युववाणी कार्यक्रम’ देखता था, तो वेस्टर्न-म्युजिक प्रस्तुत करने वाले युवक को कहा करता था कि वह हर कार्यक्रम में, कम-ज-कम एक गीत बॉब डायलन का अवश्य शामिल कर किया करे। कहने की जरूरत नहीं कि बॉब डायलन, अधिकतम लोगों तक, अपनी अधिकतम संप्रेषणीयता भी रखते हैं। लेकिन उनके गीतों को, एक गंभीर साहित्यालोचक के विवेक से देखा जाये तो उन्हें क्या टेण्डिेशियस-राइटिंग से ऊपर का दर्जा दिया जा सकता है ? वैसे तो पॉल राब्सन ने तो अपनी एक प्रतिबध्द दृष्टि को पर्याप्त प्रमाण भी दिया है। कहना ना होगा कि बॉब डायलन तो स्वयं को गायक और डांसमैन कहते रहे हैं। अपनी पापुलर गायन-विधा के लिए 1991 उन्हे ग्रैमी अवार्ड दिया जा चुका है। वे ऑस्कर भी प्राप्त कर चुके हैं तथा ‘रॉक एंड रोल हॉल ऑफ फेम’ में, वे 1988 में ही शामिल कर दिए गए थे। ‘बीटल्स’ और ’बीच-बॉयज’ के साथ सम्मानित भी हो चुके हैं। लेकिन वह अपने समूचे गाये और लिखे हुए से, केवल पॉपुलर में पूजनीय हो सकते हैं, और वे हुए भी हैं, साहित्य में नहीं। उनके प्रति मेरे मन में भी बहुत आादर का भाव ही है। लेकिन, बाजूद इसके उनको साहित्य का ‘नोबेल-सम्मान’ दिया जाना, ऐसी घटना है, जिससे बहुत सारे सवाल उठते हैं और उन सवालों के हमें कुछ तर्क-संगत उत्तरों की जरूरत भीं होगी। 
बहरहाल, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बॉब डायलन प्रथमतः तो गायक हैं और उनकी इस मेधा ने ही उन्हें गीत लेखक भी बनाया। इसलिए, उन्हें साहित्य के सम्मान के दायरे में शामिल करने में कुछ महत्वपूर्ण बातों पर विचार करना जरूरी होगा। मसलन, ये स्पष्ट है कि अब संगीत में तकनीक के प्रवेश के बाद, मा़त्र ‘संयोजन’ में बदल गया है और उसने ‘सृजन’ का वह सम्मान खो दिया है। क्योंकि ‘संयोजन’ को उसकी ‘पुनरावृति’ और ’उत्तेजना’ ही, उसकी लोकप्रियता का ढांचा खड़ा करती है। वह बुनियादी रुप से टेलिविजन माध्यम के बढ़ते वर्चस्व के बाद, एक ‘देखी’ और ‘सुनी’ जा सकने वाली विधा है, जो व्यवसाय के शिखर की सीढ़ियां चढ़ती हुई ,पापुलर की प्रतिमा की गढन्त अर्जित कर लेती है।
हम यहां, यह भी याद रखें कि ‘म्यूजिक’ अब इंडस्ट्री है और अगर बॉब डायलन को, दुनिया भर के संगीत-आयोजकों के द्वारा हाथों-हाथ लिया जाता रहा तो उसमें, पापुलर-म्युजिक की व्यावसायिकता की भूमिका रही ही है, जो व्यक्ति को ब्रांड में बदल देती है। फिर उस का क्रेज बिकता है। भारत में ही हम नजर डालें तो भूमण्डलीकरण के बाद से, टेक्नो-म्यूजिक ने हमारे यहां रेहमान को आइकनिक बना दिया है, बस उन्होंने गाने भर लिखने का काम अभी शुरू नहीं किया है। जबकि वे ‘आस्कर-सम्मान’ भी ले चुके हैं। हो सकता है, एक दिन वे पीयूष मिश्रा की तरह के गीत लिखने भी लगें या पीयूष ही रहमान के रास्ते पर निकल आयें, वे भी गाते तो हैं ही। और सेलेब भी बन चुके हैं ।
दरअसल, टेक्नोलॉजी के संगीत-उत्पाद ने, हमारी पूरी की पूरी युवा-पीढ़ी को, अपने अधीन कर लिया है। टेक्नो म्युजिक से बना पॉपुलर, एक तरह से ‘निर्वैयक्तिक की कारीगरी’ कहलाता है, जिसने ‘शाश्वत’ के प्रति, एक घोर निरादर को जन्म दे दिया है। इसी के चलते मात्र मनोरंजन ही ‘कसौटियों की कसौटी’ बन गया है । यह मनोरंजनी चलन पत्रकारिता, संगीत तथा अन्य परफार्मिंग आर्ट में, इसलिए भी स्वीकृत हो गया कि उसके पीछे ‘कल्चर इंडस्ट्री’ का पूंजी-निवेश है।
प्रश्न उठता है कि क्या इन ‘प्रतिमानों’ को साहित्य का मूल्य बनाया जा सकता है ? या कि अभी तक विश्व में, साहित्य में ‘उत्कृष्टता’ का मूल्य-निर्धारण करने वाली संस्था को, अपनी अभी तक की चली आ रही साहित्य की समझ में ही संशोधन की जरूरत पैदा हो गई है ? क्या इसे भी हम कुहन के शब्दों में कहें तो ‘पैराडाइम-शिफ्ट’ कह दिया जाए, ताकि बहस का उपसंहार ही हो जाये ? एंड्रयू रॉस ने अपनी पुस्तक ‘नो रिस्पेक्ट’ में पापुलर के समक्ष, ‘जेन्युइन’ की अवमानना के जख्मों पर उंगली रखकर, चेताया था कि हम एक नई रुग्णता के निकट हैं और हमारे उत्कृष्ट साहित्यिक मूल्य ‘मास-कल्ट’ और ‘मिड-कल्ट’ के बीच मार दिए जाएंगे । साहित्य एक दिन, घुटकर अपना दम तोड़ देगा। 
कहना ना होगा कि वास्तविक साहित्य तो हमेशा से ही दुर्दिन के बीच ही सांस लेता रहा है। चाहे भारत में संस्कृत कवि भारवि ने कहा हो या जॉर्ज लुइस बोर्खेज ने कि ‘उनके साहित्य के पारखी-जन हो सकता है, उनके अपने जीवन में ना हों , लेकिन वे केवल ‘उस सम्भावित पाठक’ के लिए अपने जीवन की ऊर्जा झोंक रहे हैं, जो एक दिन आएगा और उनका ‘वही लिखा हुआ’, पढ़कर आल्हाद से भरकर, यूरेका यूरेका कर बैठेगा ।
कुल मिलाकर प्रश्न यह उठता है कि नोबेल-सम्मान दुनिया का एकमात्र ही पुरस्कार है, जो साहित्य के लिए सम्मानजनक सार्वदेशीय स्वीकृति बनाने वाला रहा है , लेकिन वह इस घटना के बाद से ‘पॉपुलर कल्चर की करंसी’ मैं बदल गया है। यह मनोरंजनमुखी दृष्टि के समक्ष साहित्य की सबसे चिन्ताजनक पराजय है। क्योंकि दुनिया का कोई खराब से खराब भी जनतंत्र भी हो, तो उसमें भी साहित्य की ‘उत्कृष्टता’ को ‘बहुल’ के बीच लोकप्रियता के आधार पर बिलकुल ही तय नहीं किया जा सकता। वहां उत्कृष्टता के निर्णय का आधार ‘बहुमत’ को बनाना, निर्विवाद रूप से अपमानजनक प्रसंग होगा। गीत या संगीत के सहारे भारतीय फिल्मों के कई गीत ऐसे हैं जिन्हें मैं पिछले कई सालों वर्षों से, लगभग एक दो दिन के अन्तराल से, कहीं न कहीं सुनता ही आ रहा हूं। वे अभी भी जीवित हैं । लेकिन क्या उन्हें हम निराला की ‘राम की शक्ति पूजा’ या मुक्तिबोध की कविता से ऊपर का मान सकते हैं ? मसलन गुलजार का गीत ‘जय हो’ ऑस्कर से सम्मानित हो गया। लेकिन वह गुलजार की ही काव्य-प्रतिभा का क्या सहश्रांश भी है ? 
क्या नोबेल पुरस्कार निर्णायकों के समक्ष संसार भर की साहित्यिक बिरादरी में, एक भी ऐसा वास्तविक लेखक-कवि दिखाई नहीं दिया, जो एक पापुलर की विधा के व्यक्ति को, जो सैकड़ों अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से पहले ही सम्मानित है, को चुनने को वे विवश हो गए ? क्या समिति को अपनी दृष्टि, ‘तीसरी दुनिया’ के लेखकों की तरफ से नहीं डालनी चाहिए थी ? जिनका प्रतिनिधित्व नोबेल-पुरस्कार के लिये, हमेंशा से ही न्यूनतम ही रहा है। क्या, जेनिफर ईगन, तेहू कोल कार्सन के नामों पर विचार नहीं किया जा सकता था ? यहां तक कि ऑनलाइन पर अपनी कविता की प्रखरता को स्थापित करने वाले वार्सन शाइर सन 2014 का ‘फस्र्ट पोएट लौरेट’ का सम्मान हासिल कर चुके है कि तरफ भी उनकी निगाह नहीं गई। ? बहरहाल, नोबेल-समिति को सोचना चाहिए था कि बॉब डायलन, जिनको इतने सारे सम्मान मिल चुके हैं , उन्हें साहित्य के नोबेल-सम्मान की जरूरत नहीं है। लेकिन साहित्य को नोबेल की बहुत जरूरत है। क्योंकि वह धीरे-धीरे हाशिए पर धकेला जा रहा है और उसने इस वर्ष से तो इस पर से, अपने दावे को खोने की शुरूआत ही कर ही दी है।
हिंदी में एक कहावत है कि उसी के सहारे से, ये आशंका तो प्रकट की ही जाना चाहिये कि मौत ने घर देख लिया है।
प्रभु जोशी, 303, गुलमोहर-निकेतन, वसन्त-विहार, शान्तिनिकेतन के गेट के पास, इन्दौर,


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