Monday, January 27, 2025

संत चौक मतलब स्टोरी चौक


                                                                            व्यंग्यकार अनूप शुक्ल 


                     आजकल पढ़ने के हाल कुछ ऐसे हो रखे हैं कि विरले ही कोई किताब एक बार में पढ़ ली जाए। किताब मंगाते हैं। उलट-पलट के थोड़ा बहुत पढ़ते हैं। कभी भूमिका, कभी प्रस्तावना। कभी अंदर का भी कुछ। कुछ दिन में किताब अक्सर किनारे भी हो जाती है, तसल्ली से पढ़े जाने के लिए। लेकिन जवाहर चौधरी जी के नवीनतम उपन्यास ( उनका तीसरा उपन्यास) 'संत चौक' के साथ ऐसा नहीं हुआ। 20 जनवरी को जवाहर चौधरी जी के उपन्यास के छपने की सूचना मिली। अद्विक पब्लिकेशन को पैसा भेजकर उसी दिन ख़रीद लिया उपन्यास। 25 जनवरी को उपन्यास मिला। पढ़ना शुरू करते हुए थोड़ा अटके लेकिन फिर एक बार पठन-प्रवाह बना तो फिर दो दिन में पूरा उपन्यास पढ़ डाला। इसे इस उपन्यास की रोचकता और पठनीयता का प्रमाण माना जा सकता है।
              उपन्यास वैसा ही है जैसा परिचय में बताया गया है -'उपन्यास में हमारे आसपास के पात्र हैं जो रोजमर्रा की कठिनाइयों और समस्याओं से जूझते और उनमें ही आनंद के अवसर जुटाते हुए जिंदगी गुज़ारते हैं। उपन्यास जीवन की, ख़ासकर हालिया समय के समाज की, कड़वी सच्चाइयों से हमें परिचित कराता है।
उपन्यास के पात्र मुकेश के बहाने नोटबंदी, सरकार के अघोषित नियंत्रण के तरीक़ों, जातिप्रथा की कड़वी सच्चाई, राजनीतिज्ञों के जुमलों, सांप्रदायिकता की राजनीति जैसी तमाम रोजमर्रा की बुराइयों पर सरसरी निगाह डालते हुए उपन्यास का तानाबाना बुना गया है।
ऐसा लगता है कि मुकेश को उपन्यास की रिपोर्टिंग करने के लिए ही संतनगर भेजा था जवाहर चौधरी जी ने। संत नगर में इतने किस्से होते हैं उपन्यास का एक पात्र कहता है," इधर सब लोगों का कोई न कोई स्टोरी है। जिसको भी मुँह खोलने को बोलो तो ज़ुबान पे एक स्टोरी तैयार मिलती है। संत चौक का नाम स्टोरी चौक करना चइए।"
               आज के समय को बयान करते हुए चौधरी जी लिखते हैं ," नासमझी को अनदेखा करते रहना आज सबसे बड़ी समझदारी है। दिशा देने को कहा गया है ,"जाही विधि राखें राम,ताहि विधि रहिए।" इस पंक्ति में राम नहीं हैं सरकार है, सरकार मतलब हुज़ूर हैं, साहब हैं। विधि नियम और क़ानून को कहते हैं। इस एक पंक्ति से व्यवस्था या सिस्टम को समझा जा सकता है। महंगाई बढ़ रही हो, नौकरियाँ जा रही हों, मौतें हो रहीं हों, संस्थान बिक रहे हों, लोग दरबदर हो रहे हों तब भी कहीं बेचैनी उजागर नहीं है। अच्छा हो रहा हो या न हो रहा हो आप भक्ति भावना से मज़ा लीजिए, जो भी बुरा हो रहा हो उसे मुर्दों के खाते में डाल दीजिए।

एक समय बात-बात पर प्रधानमंत्री के छप्पन इंच के सीने वाले बयान के मज़े लेते हुए जवाहर चौधरी जी लिखते हैं," नुकती के पहाड़ के दो ढेर देखकर पार्षद-पति मोतीराम शर्मा और बोतल का सीना चौवन और त्रेपन हो रहा है और वे एक राष्ट्रीय रिकार्ड के काफ़ी क़रीब पहुँच गए हैं।"
             धार्मिक कट्टरपंथी लोगों की सोच व्यक्त करते हुए यह संवाद देखिए," ख़ामोश...दो धर्मों के बीच नफ़रत होती है प्रेम कैसे हो सकता है। अगर कोई प्रेम करेगा तो हम करने नहीं देंगे। हम लोगों को जागरूक करेंगे। सच्चा जागरूक व्यक्ति कभी प्रेम नहीं करता है।"
            हिंदू धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन के कारण पर विचार करते हुए लिखते हैं जवाहर चौधरी," अगर अपने धरम में किसी को लात-जुटे मिलें, जानवरों की सी ज़िंदगी मिले, बासी जूठा खाना पड़े, घर में तख़त-कुर्सी नहीं रख सके, दूल्हा घोड़ी नहीं चढ़ सके न ही मंदिर की सीढ़ियाँ तब तो आदमी धरम बदलेगा ही ना! जिसको खाने को मिल रहा है, इज्जत मिल रही है तो वो धरम उसका है और वो धरम का है।
              कुल 127 पेज के इस उपन्यास में जवाहर चौधरी जी आज के समय की तमाम विसंगतियों पर सरसरी निगाह डालते हुए रोचक अन्दाज़ में व्यंग्य किया है।
उपन्यास के कुछ पंच वाक्य जो पहली पढ़ाई में नोट कर पाया मैं वे यहाँ पेश हैं:

जवाहर चौधरी जी के उपनयस 'संत चौक' के कुछ पंच
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1. विज्ञापन कहते हैं कि ये चीज़ नहीं है अगर आपके पास तो मानों कि आप मनुष्य ही नहीं हैं। पता नहीं चलता कि लोग जीने के लिए मरे जा रहे हैं या विज्ञापनों में समा जाने के लिए।

2.साहब छोटी जात के हैं, इसलिए कुर्सी तभी ग्रहण करते हैं जब सवर्ण सिपाही गस्त पर होते हैं। बाक़ी समय वे बाक़ायदा बेंच शेयर करते हैं या टहलते रहते हैं। अन्यथा न लें इसे आस्था और संस्कार कहते हैं। आप जानते ही हैं कि आस्था हमेशा क़ानून से बड़ी होती है और संस्कार सभ्यता से।

3. बस चलाना हो या देश, न सुनना चलते रहने के लिए ज़रूरी माना जाता है।

4. सरकार किसी काम की नहीं होती। बोतल का वादा करके एक पउवे में वोट ले लेती है कमबख़्त।

5. भाग्य पर भरोसा करने की परम्परा नहीं हो तो इधर क्रांति होने में देर न लगे।

6. लोग संगठित हों तो ड्राइवर-कंडक्टर चाहे देश के ही क्यों न हों, ढीले पड़ जाते हैं।

7. गुंडे बदमास किसके भाई नहीं होते आजकल? दाऊद पूरे देश का भाई है कि नहीं।

8. आज कौन सा ऐसा धंधा है जिसमें चोट्टई नहीं होती है?

9. दुनिया जेबकटों से भरी पड़ी है। कोई छोटा कोई बड़ा, कोई छुपा है कोई उजागर।

10. मुसीबतें कभी अकेले नहीं आतीं हैं, वे प्रायः गठबंधन करके मोर्चा लेती हैं।

11. शरम जान पहचान वालों के बीच आती है, अनजान लोगों के बीच आदमी को सिर्फ़ हिम्मत आती है।

12. साहब को साहब बनाए रखने की ज़िम्मेदारी भी गरीब गुरबों पर ही होती है। जो लोग बस कंडक्टर की घुड़की से गोल हो जाते हों वो साहब के आगे एक ज़रूरी 'चीं' भी निकाल पाएँ इसमें संदेह है।

13. अगवाड़े जितना झक्क-भक्क मेकअप है पिछवाड़े उतनी ही गंदगी है।उस्ताद का कहना है इसी को मार्डन ज़माना कहते हैं।

14. जिसमें खोज की खाज होती है वही अच्छा पत्रकार बनता है।

15. आदमी महान वही होता है जिसके चेले बड़ी संख्या में हों। नाम तब क़ायम रहता है जब नाम लेवा हों।

16. आदमी पैसे के साथ दिक़्क़त कमाता है। कम कमाई कम दिक़्क़त, ज़्यादा कमाई ज़्यादा दिक़्क़त।

17. अव्यवस्था को बनाए रखने का प्रयास ही व्यवस्था है। पहले यह ज़िम्मेदारी धार्मिक पाखंडियों के पास थी, अब राजनीतिक गुंडों के पास भी है।

18. नासमझी को अनदेखा करते रहना आज की सबसे बड़ी समझदारी है।

19. जहां गफ़लत जैसा कुछ होता है वहाँ प्रेम जल्दी फलित होता है।

20. जब 144 लगी हो तो पुलिस से नहीं उलझना चाहिए। ऐसे मौक़ों पर पुलिस डंडा सेवक होती है।

                उपन्यास शायद प्रकाशक द्वारा पुस्तक मेले के मौक़े पर लाने के उद्धेश्य थोड़ा जल्दबाज़ी में छपा है। इसके चलते कुछ वर्तनी की छुटपुट चूक रह गयी हैं।कुल बीस भागों में छपे उपन्यास के हर भाग की शुरुआत में छपे फ़ोटो साफ़ नहीं हैं। बेहतर होता उनको छोड़ ही दिया जाता। आगे की प्रतियों में शायद इसे ठीक किया जा सके।
            
               जवाहर चौधरी जी को उनके इस रोचक उपन्यास के लिए बधाई।

 

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