Friday, January 15, 2010

* युवक के मुंह में ठूंसा मानव-मल !! ईसाई क्या सवर्ण हिन्दू बन गए हैं ?

15 जनवरी के जनसत्ता में पृष्ठ नौ पर खबर है कि तमिलनाडु के डिंडीगल स्थान पर 07 जनवरी 2010 को सदायंदी नाम के एक दलित युवक को पकड़ कर उसके मुंह में मानव मल/टट्टी भर दी , क्योंकि उसने ईसाइयों की सड़क पर चलते वक्त चप्पलें पहन रखीं थी !! वहां के ईसाई मोहल्ले में दलितों को चप्पल पहन कर चलने की मनाही ईसाइयों ने कर रखी है । सब जानते हैं कि भारत के ज्यादातर ईसाई हिन्दू धर्म से धर्मांतरित हुए दलित हैं । हिन्दुओं की उच्च जातियों में धर्मांतरण की प्रवृत्ति नहीं है । सदायंदी ने पुलिस में बयान दिया कि दस से अधिक ईसाइयों के एक समूह ने मुझे रोका और सड़क पर चप्पल पहने होने के कारण मेरे मुंह में मानव मल घुसेड़ दिया और शेष मल चेहरे पर मल दिया । ईसाइयों का कहना है कि बुजुर्ग दलित जब उनकी सड़क पर चलते हैं तो चप्पल नहीं पहनते हैं लेकिन युवा इस आज्ञा की अवहेलना करते हैं ।

भारत में जाति प्रथा की जड़े और उससे जुड़ी कडवाहटें कितनी गहरे तक अपना असर रखती हैं इसे देश में कहीं भी देखा जा सकता है । उच्च जातियों ने उन्हें वो स्थान भी नहीं दिया जो एक पालतू पशु को प्राप्त रहता है । उनकी न्यून आवश्यकताओं के बारे में कुछ न भी कहा जाए , किन्तु घरती पर सामान्य रुप से चलने-फिरने तक में सदियों से अनेक प्रतिबंध रहे हैं । मंदिर में प्रवेश की बात तो आज भी सोची नहीं जा सकती है । राजनीति करने वाले पुलिस के दबाव के साथ एकाध बार मंदिर में इन्हें दर्शन करवा दें परंतु जनभावना में यह स्वीकार्य नहीं है । अंबेडकर भी मंदिर प्रवेश की मांग करते रहे किन्तु वे सफल नहीं हुए ।



दुःख की बात यह है कि जातीय भेदभाव के कारण निम्नजाति के जो लोग धर्मातंरण कर गए और ईसाई या मुस्लिम बन गए वे भी जाति के इस जंजाल से मुक्त नहीं हो पाए हैं । वे जहां गए हैं वहां उन्हें जाति-मुक्त सम्मान नहीं मिला है । अपमानित हो कर अगर किसी समूह में कोई जाता है तो उसे प्रायः आश्रय मिलता है सम्मान नहीं । तो धर्मांतरण से फर्क क्या पड़ा ? फर्क यह पड़ा कि जिस निम्नजाति का वह सदस्य था अब वो उनसे ही घ्रणा करने लगा । अपनी ही पूर्व जाति के शेष रह गए लोगों से वह उच्च हो गया । अब उसके लिये वे निम्न हो गए ! अछूत हो गए ! मौका मिलते ही उन पर अब वह सवर्णों जैसा व्यवहार करता है !

प्रश्न यह है कि धर्मांतरण भी जाति समस्या का हल नहीं है । पीड़ित स्वयं मौका मिलते ही वही करने लगता है जिससे दुःखी हो कर उसने अपना धर्म छोड़ा था ! अपने को उच्च दिखाने की यह प्रवृति मानसिक रोग तो नहीं है !!

3 comments:

  1. यह सचमुच मनोरोग है...कुंठा है | ऐसे समाचार पढ़कर दुख होता है | मानवाधिकार आयोग और ढ़ेरों स्वंयसेवी संगठनों के बावजूद ये हाल है |

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  3. इन ढकोसलेबाज "मानवता के सेवकों को" बे-नकाब करना बेहद ज़रूरी है , मिशनरियों के आड़ में धर्म-परिवर्तन और फिर धार्मिक असंतुलन बनाकर देश का विघटन यही एकमात्र घोषित अ-घोषित लक्ष्य है इनका ... सेकुलरवादियो को यह खबर पढने में नहीं आई होगी अब तक ...जाने कब शासन-प्रशासन जागेगा और इन्हें ज़रूरी सबक सिखाएगा...???

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