Tuesday, March 18, 2025

 

पुस्तक समीक्षा

                           *सामाजिक संवेदना व्यक्त करती अनूठी व्यंग्य कृति* 

                                                -सूर्यकांत नागर


जवाहर चौधरी व्यंग्य-क्षेत्र का महत्वपूर्ण नाम है। वे आधी सदी से अधिक समय से इस क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनकी रचनात्मकता उनकी सामाजिक प्रतिबद्धता की प्रतीक है। उनके कृतित्व में समकालीन साहित्य के लगभग सभी कथ्य मौजूद हैं। दरअसल उनके व्यंग्य विरोधाभाषी स्थितियों के प्रति एक संवेदनशील व्यक्ति की प्रतिक्रियाएं हैं जिन्हें वे एक बड़े वर्ग के साथ बांटना चाहते हैं। जब भी व्यवस्था में विसंगति, विषमता, अन्याय, भ्रष्टाचार, मिथ्याचार देखते हैं, वाजिब गुस्से से भर आते हैं। जब यह गुस्सा कार्यरूप में परिणत नहीं हो पता तो व्यंग्य का रूप ले लेता है। पीड़ित आक्रोश को व्यक्त करने की असहायता का वैकल्पिक रूप ही व्यंग्य है। जवाहर का आक्रोश अराजक नहीं है। वह सात्विक और ईमानदार है। वहाँ शोर नहीं है। उद्देश्य सुप्त विवेक और लोकमांगलिक चेतना जाग्रत करना है। चौधरी के लिए व्यंग्य लेखन एक इलहाम है। नैसर्गिक गुण, देवीय वरदान। उनका साहित्य प्रतिरोध का साहित्य है। प्रतिरोध का कथा-शिल्प देखना हो तो हमें जवाहर के सृजन के गुजरना होगा। वैसे भी प्रतिबद्धता के लिए किसी विचारधारा विशेष से बंधा होना जरूरी नहीं है। प्रतिबद्धता तो इस बात से तय होती है कि जीवन संघर्ष में लेखक किसके पक्ष में खड़ा है। 

जवाहर का नया उपन्यास संत चौकउनकी व्यंग्य यात्रा का अगला सौपन है। समकालीन संवेदना से जुड़ा शायद ही कोई मुद्दा हो जो उनकी कलम की नोक पर न उतरा हो। इसमें समाज है, राजनीति है, नेता है, पुलिस है, अफ़सर और बाबू हैं और पत्रकार भी। पाखंड की चौड़ी होती खाई है और गरीब की बेवक्त होती मौत भी। प्रथम अध्याय में संत चौक की स्थानीयता का विस्तृत विवरण है जो चौक की संस्कृतिसे परिचित करता है। पूरा किस्सा गोपालगंज से संत चौक की यात्रा और वहाँ से वापसी का है। यह महज बस-यात्रा नहीं है। यह अपने में बड़ी दुनिया समेटे है। निजी बस वालों की दादागिरी के तहत यात्रियों को बस में भेड़-बकरियों की तरह ठूँसा जाता है। उनके साथ पशुवत व्यवहार किया जाता है। ठसाठस भरी बस के संदर्भ में व्यंग्यकार की यह उक्ति देखिए - लोग बीड़ी के बंडल की तरह टाइट दम साधे खड़े हैं।

            उपन्यास मुकेश खन्ना की व्यथा कथा है जो नोटबंदी के बाद रद्दी हो गए पचास हजार के नोट के बदले कुछ जायज नोट पाने की जुगाड़ में संत चौक आता है, जहां बोतल भैया हैं जो जेबकतरों के सरगना और नोट बदलने की कला में माहिर हैं। दुर्भाग्यवश बस से उतरते ही मुकेश की जेब कट जाती है और वह दोहरी विपत्ति का शिकार हो जाता है। नोटबंदी काले धन को पकड़ने के लिए की गई थी, पर प्रक्रिया की वजह से आम आदमी के समक्ष भी अनेक समस्याएं पैदा हुईं। 

यह भी बताया कि नासमझ महिला पार्षद हो या सरपंच, उसके तमाम काम-काज की डोर पति के हाथों में होती है जिसका वे भरपूर लाभ उठाते हैं। पार्षद-पति, मोती भैया, जो बोतल भैया के खास आदमी हैं, का कच्चां चिट्ठा भी शिद्दत से खोला गया है। (चोर-चोर मौसेरे भाई)। नेता लोगों की बहानेबाजी और वाक-पटुता को भी पेश किया है। 

            संत चौक आने के बाद सब कुछ गंवा चुके मुकेश खन्ना  को जीवन-निर्वाह के लिए कई प्रकार के काम करना पड़ते हैं। उसने सड़क पर झाड़ू लगाई, होटल में वेटर का काम किया, लोगों के उलाहने सुने। इस बहाने लेखक ने तथाकथित शानदार होटलों की कार्यशैली और वहाँ किचन में फैली असह्य गंदगी को उजागर करने के अवसर भी तलाश लिए। बाहर सजी टेबल पर चमचमाती प्लेटों में परोसी गई सब्जियों में जूठन तक हो सकती है, शायद ही इसका अनुमान उपभोक्ताे को हो। स्वार्थ और लालच व्य वसायी को किस हद तक गिरा सकता है, यह इसका उदाहरण है। स्वार्थ के आगे संवेदना समाप्त हो जाती है।

            आज की पत्रकारिता पर भी जवाहर भाई ने तंज कसा है। आज खोजी पत्रकारिता का जमाना है। अधिकांश पत्रकार, विशेषत: छुट भैया, पत्रकार बिके हुए हैं। पत्रकारों और नेताओं के हफ्तेबंधे हैं। अख़बारों की विश्वंसनीयता समाप्त हो चुकी है। आज पत्रकारिता मिशन न होकर व्यवसाय बन गई है। शैलू और पीलू के माध्यम से अख़बारनवीजी को बेपर्दा किया है। व्यंग्यकार की नज़र आज के ज्वलंत मुद्दे लव जिहाद पर भी है। आए दिन हम लव जिहाद के किस्से अख़बार में पढ़ते हैं। लव जिहाद को लेकर दंगे-फसाद हो रहे हैं। उन पर सांप्रदायिकता का रंग चढ़ाया जा रहा है। जमकर अफवाहें फैलायी जाती हैं। पुलिस, नेता और संगठनों के अपने-अपने स्वार्थ हैं। ऐसे में अफवाहें आग में घी का काम करती हैं। केले बेचने वाला गोविंदा का प्रेम प्रसंग सामने के शोरूम के उपर रहने वाली लड़की से चल रहा है। एक दिन दोनों भाग जाते हैं। अफवाह फैलती है कि गोविंदा मुसलमान है- गुलशन और वह हिंदू लड़की को भगाकर ले गया है। चौक में आग सुलग उठती है। ऐसे में भी पुलिस, नेता और जनता की अपनी सोच है। नेताजी को आशंका है कि उसके क्षेत्र में यदि साम्प्रदायिक दंगा फैला तो हो सकता है आगामी चुनाव में उसका पार्टी-टिकट कट जाए।

उपन्यास का महत्वपूर्ण अंश वह है जहां बताया गया कि परिवेश, परिस्थिति और जरूरत अनुसार प्रवासी लोग स्थानीय तौर-तरीके अपनाकर कैसे स्वयं को स्थापित कर लेते हैं। स्थानीय ढ़ांचे में ढ़ाल लेते हैं। जात-पात और नाम-धाम की बेड़ी शिथिल हो जाती है। उपन्यास का नायक मुकेश खन्ना वास्तव में मुकेश मिश्रा है। दादा ने गांव बदला था तो नए स्था न पर बैरागी की जगह यादव हो गए। जैसा देश वैसा भेष की उक्ति को सार्थक करते हुए। संत चौक में छेनू भारतीय की पान की दुकान है। मोची का काम कर रहा भरोसे ब्राह्मण हैं, मजबूरी में जूते गांठ रहा है। एम.ए. पास गोविंदा ठेले पर केले बेच रहा है।

तलछट में रहने वाले दलितों, पीडि़तों और शोषितों को कई तरह के लालच देकर धर्म परिवर्तन कराया जाता है। उपन्यास में जातिगत भेदभाव पर कड़ा प्रहार है। दलितों को अछूत माना जाता है। उनके साथ अमानवीय व्यावहार किया जाता है। वे मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते। सार्वजनिक कुएं से पानी नहीं भर सकते। (लेकिन उस लकड़ी से भट्टी में खाना बना सकते हैं जिसके बनाने में दलित मजदूरों के हाथ लगे हैं और उस कुवें का पानी पी सकते है जिसके बनाने में दलित श्रमिकों के हाथ लगे हैं।) व्यंग्यकार उपेक्षितों की पीड़ा के शब्दांकन में सफल हुआ है। कुछ प्रसंगों में व्यंंग्य में हास्य  के छींटे हैं, पर वे मनोरंजन के लिए नहीं, विसंगति के उपहास के लिए हैं। 

लेखक की सूक्ष्म़ दृष्टि, अभिव्यक्ति कौशल और प्रतीका‍त्मकता देखना हो तो प्रयुक्त कतिपय उक्तियों एवं वाक्यांशों पर गौर करना होगा, यथा (1) आदमी पैसे के साथ दिक्कत भी कमाता है। (2) भीड़ का कोई चेहरा नहीं होता। (3) कोप को आनंद से नष्ट  किया जा सकता है। (4) खूंटे से बंधे बकरे से कसाई कितना ही लाड़ जताए, पर .......। (5) सरकार का जनसंख्या से कुछ लेना देना नहीं होता तो वह समोसे की तरह लाल तिकोण क्यों बनाती? (6) प्याउ लगाने से (उन्हें) शायद अनअकाउंट पेई यानी डिजिटल पुण्य मिलता हो। (7) मूंछे ही फोटो की वज़ह है वरना शक्ल तो उनकी मरीजों जैसी है। (8) शरम जान-पहचान वालों के बीच होती है। (9) पत्रकारों की बाइक पेट्रोल से नहीं, हुनर से चलती है। (10) बापू किसी को डराने के लिए नहीं, अपने सहारे के लिए रखते थे। 

कुल मिलाकर –‘संत चौकसहमे समय से रूबरू कराती एक वैचारिक प्रायोगिक कृति है जो दूर तक सोचने पर बाध्य करती है। व्यंग्यकार में प्रातिभ कौंध में सत्य को पकड़ने की क्षमता है। इस निमित्त उसके पास कलफविहीन व्यंजनात्मक भाषा है। उनकी सीधी रेखाओं में जो वक्रता है, वही उनकी पहचान है। कृति से गुज़रना निश्चित ही अलग तरह का अनुभव है। 

 

                                                                                                      -सूर्यकांत नागर

                                                                                                                                                           81, बैराठी कॉलोनी नं-2, 

                                                                               इन्दौूर-452014 (म.प्र.)

                                                                                मो- 98938-10050

संत चौक’ (उपन्यास)

लेखक : जवाहर चौधरी

अद्विक प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली

मूल्यक : 200 रूपए

 

समीक्षा  

 

    ‘सन्त चौक’ : विकृतियों का आख्यान बज़रिये व्यंग्य!

                                      प्रकाश कान्त 



  

 

        ‘सन्त चौक यूँ तो कहीं नहीं है लेकिन सब जगह है!’ उसमें जीवन की सारी कड़वी-मीठी सचाइयाँ हैं. यह वरिष्ठ व्यंग्यकार जवाहर चौधरी के व्यंग्य उपन्यास ‘सन्त चौक’ का परिचय है. इधर जो व्यंग्यकार अपने तीखे, महीन और मारक व्यंग्य के लिए विशेष रूप से जाने गये हैं, जवाहर चौधरी उन्हीं में से एक हैं. सिर्फ़ आलेखों ही नहीं बल्कि अपनी कथा रचनाओं के व्यंग्य के लिए भी! कहानियों के अलावा उनके ‘उच्च शिक्षा का अंडरवर्ल्ड’ और अभी आये ‘सन्त चौक’ जैसे उपन्यासों के व्यंग्य को देखकर इसे समझा जा सकता है.      .       उनके ताज़ा उपन्यास ‘संत चौक’ की पृष्ठभूमि में नोटबंदी है. जिसमें मुकेश अपनी पत्नी के दिये बंद हुए चालीस हजार के नोट बदलवाने अपने गाँव गोपालगंज से ‘सन्त चौक’ आया हुआ है. वहाँ उसके नोट तो नहीं बदलते, जेब ज़रूर कट जाती है. सारा क़िस्सा इसके बाद का है. वह बिना पैसे हासिल किये लौटना नहीं चाहता. इसी क्रम में उसे सन्त चौक के सारे भले-बुरे अनुभव होते हैं.

      ‘सन्त चौक’ पहले जंगल था. फ़िर वह आबाद हो गया. वहाँ के सन्त सिंहस्थ गये लेकिन लौटे नहीं! अब वहाँ सब हैं- लुटेरे, ठगोरे, बेईमान, जेबकतेरे सब! भरोसे, उस्ताद, प्रियंका, राजहँस होटल के मेनेजर जैसे कुछ अच्छे लोग भी हैं. थाना, रिपोर्ट, विधायक, बोतल, गोविंद केलेवाला, साम्प्रदायिक तनाव, तोड़फोड़, आगजनी, जागरण संगठन, धार्मिक घृणा, लव जिहाद जैसी सारी चीज़ें यहीं और इसी दरमियान हैं.काफ़ी कोशिशों के बाद भी  मुकेश को पैसे नहीं मिलते और अंततः उसे ख़ाली हाथ लौटना पड़ता है.

      उपन्यास में बीस अध्याय हैं. जो स्थानीय राजनीति, धर्म और तंत्र में मौजूद जातिवाद, धार्मिक पाखण्ड, साम्प्रदायिक विद्वेष, बेरोजगारी जैसी तमाम राष्ट्रव्यापी विकृतियों को रेखांकित करते हैं. एक ज़रूरी व्यंग्य-दृष्टि के साथ! यूँ भी ये चीज़ें इतनी सामान्य और सहज मान ली गयी हैं कि इनके भीतर की गंदगी व्यंग्य के आलावा किसी और तरह से देख-कह कर नहीं उभारी जा सकती! जिस तरह से ‘राग दरबारी’ (श्रीलाल शुक्ल)  का शिवपालगंज राष्ट्रीय सत्य है और वह हर जगह है ठीक बात सन्त चौक के साथ भी है. वह    मूलतः ‘अंधों का हाथी है’ जहाँ ‘हर एक को उसका सच मिल जाता है.’ उपन्यास इन सचों को कई तरह से ‘रेखांकित करता है जैसे बक़ौल लेखक, अच्छी शराब और दो-चार चिकन ड्रमस्टिक मिल जाने पर लेखक, कवि, पत्रकार अच्छा लिखने लगते हैं..., बस हो या देश उसे चलाते रहने के लिए न सुनना ज़रूरी है..., पूरा देश भीड़ हो गया है जो बास मार रहा है..., सांड के लिए पुलिस चौकी और दुकान एक ही चीज़ है..., दुनिया जेबकटों से भरी पड़ी है, जिसमें बोतल जैसे जेबकट हस्तकला की तरह दक्षता रखते हैं..., शर्म की उम्र छोटी होती है..., साहब को साहब ग़रीब बनाये रखते हैं.... नौकरी सरकार के पास भी नहीं है, वह जुमलों से काम चलाती है..., ख़राब काम करने के लिए जनता नेता रखती है, नौकर नहीं...., लुच्चे, लफंगे, चोर, उचक्के, हत्यारे, बेईमान सब पवित्र नदियों में नहाकर लॉन्ड्री-फ़्रेश हो जाते हैं..., धर्म सहयोगी हो तो नेताओं को भगवान का डर नहीं रहता, ईश्वर को पता है कि उसकी सत्ता तभी तक कायम है जब तक उसका मुँह बंद है, बिना पाप के राजनीति नहीं चलती, जनता पापियों में से ही चुनती है.... नफ़रत करने वालों को हार पहनाये जा रहे हैं.... कानून से पोथी बड़ी है, रीति-रिवाज़ ग़रीब को मारने के लिए होते हैं...इत्यादि!   

      ‘सन्त चौक’ का पूरा यथार्थ इसी तरह के व्यंग्य के ज़रिये कहा गया है. बल्कि, कहा जाना चाहिए कि चौक का जो विद्रूप है वह व्यंग्य के नज़रिये से ही उभरा है. वह इतना घिनौना है कि किसी और नज़रिये से समूचा सामने आ ही नहीं सकता! शिवपालगंज हों या सन्त चौक उन्हें और किसी तरह से ठीक-ठीक सामने नहीं लाया जा सकता. हालाँकि, शिवपालगंज साठ-सित्तर के दशक का था और सन्त चौक इक्कीसवीं सदी के दूसरे दशक का है ! पचास-साठ साल का फ़ासला है. इस बीच घिनौनेपन ने काफ़ी तरक़्क़ी कर ली है. बेशर्मी ने भी!! बेशर्मी जीवन मूल्य है.

      सन्त चौक की पूरी बेशर्मी के सामने लाठी लिये गाँधी की प्रतिमा खड़ी है. जिसके आसरे और भरोसे एक पगली बुढ़िया पड़ी है. प्रतिमा और बुढ़िया पूरे चौक पर एक गम्भीर टिप्पणी है! आजादी के बाद सब बना लेकिन एक गाँधी नहीं बन पाया! - यह इस टिप्पणी का सारांश है. और पूरे सिस्टम की हक़ीक़त का बयान भी!

      वैसे, उपन्यास कई जगह स्थितियों को व्यंग्येतर ढंग से भी देखने-समझने की   कोशिश करता है. रोज़गार के मुद्दे पर जो व्यंग्य है उसमें एक ख़ास तरह का अवसाद और पीड़ा भी हैं. चाहे जूते गाठने का मुद्दा हो या फ़िर एम.ए. उत्तीर्ण का केले बेचने का! जिस ‘सरकार के पास भी नौकरियाँ नहीं है वह जुमलों से काम चलाती है’  यह कहना स्थिति के पीछे की भयावहता को रेखांकित करता है. सांप्रदायिकता के प्रश्न पर भी जो दृष्टि है वह सिर्फ़ व्यंग्य की नहीं है. वहाँ उन स्वरों की प्रधानता और मुखरता है जो व्यंग्य से अलग हैं . दरअसल, सतही उपहास और मज़ाक की बात रहने दें तो वास्तविक व्यंग्य के पीछे कहीं एक तरह की करुणा होती है. जो जितनी गहरी होती है, व्यंग्य वहाँ उतना ही गहरा और मारक होता है. वैसे में, हास्य कहीं बहुत पीछे छूट जाता है. तब रचना अलग धरातल पर दिखाई देती है.

       ‘सन्त चौक’ के सच के कई शेड हैं. होटल की जूठन से लेकर साम्प्रदायिक मानसिकता की क्रूरता तक! राजनीति का घिनौनापन, पाखण्डों का प्रदर्शन वग़ैरह तो है ही! जिस सब का शिकार अंततः एक साधारण आदमी होता है. उपन्यास में सन्त चौक की अलग से कोई कथा नहीं है. बल्कि सन्त चौक में मौजूद अलग-अलग कथाओं के ज़रिये सन्त चौक की कथा आकार लेती है. जिनके ज़रिये सन्त चौक अंततः पाठक को अपना सन्त चौक अनुभव होने लग जाता है. ख़ुद के उसका एक हिस्सा हो जाने की हद तक! ‘उच्च शिक्षा का अंडर वर्ल्ड’ में उच्च शिक्षा से जुड़े सम्मानित समाज की सारी विकृतियाँ थीं, ‘सन्त चौक’ में आम और ख़ास हर तरह के आदमी से जुड़े सन्त चौक की विकृतियाँ हैं. जवाहर चौधरी दोनों को अपने समर्थ और स्वाभाविक व्यंग्य के माध्यम से सामने लाने में सफल रहे हैं, कथा की गति एक जैसी बनाये रखते हुए! उपन्यास अपने कसे हुए ढाँचें के भीतर एक सार्थक व्यंग्य कथा की चुभन और तिलमिलाहट पैदा करता है.

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155 - एल.आई.जी.

मुखर्जी नगर, देवास (म.प्र.)

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मो. 9407416269

 


Monday, January 27, 2025

संत चौक मतलब स्टोरी चौक


                                                                            व्यंग्यकार अनूप शुक्ल 


                     आजकल पढ़ने के हाल कुछ ऐसे हो रखे हैं कि विरले ही कोई किताब एक बार में पढ़ ली जाए। किताब मंगाते हैं। उलट-पलट के थोड़ा बहुत पढ़ते हैं। कभी भूमिका, कभी प्रस्तावना। कभी अंदर का भी कुछ। कुछ दिन में किताब अक्सर किनारे भी हो जाती है, तसल्ली से पढ़े जाने के लिए। लेकिन जवाहर चौधरी जी के नवीनतम उपन्यास ( उनका तीसरा उपन्यास) 'संत चौक' के साथ ऐसा नहीं हुआ। 20 जनवरी को जवाहर चौधरी जी के उपन्यास के छपने की सूचना मिली। अद्विक पब्लिकेशन को पैसा भेजकर उसी दिन ख़रीद लिया उपन्यास। 25 जनवरी को उपन्यास मिला। पढ़ना शुरू करते हुए थोड़ा अटके लेकिन फिर एक बार पठन-प्रवाह बना तो फिर दो दिन में पूरा उपन्यास पढ़ डाला। इसे इस उपन्यास की रोचकता और पठनीयता का प्रमाण माना जा सकता है।
              उपन्यास वैसा ही है जैसा परिचय में बताया गया है -'उपन्यास में हमारे आसपास के पात्र हैं जो रोजमर्रा की कठिनाइयों और समस्याओं से जूझते और उनमें ही आनंद के अवसर जुटाते हुए जिंदगी गुज़ारते हैं। उपन्यास जीवन की, ख़ासकर हालिया समय के समाज की, कड़वी सच्चाइयों से हमें परिचित कराता है।
उपन्यास के पात्र मुकेश के बहाने नोटबंदी, सरकार के अघोषित नियंत्रण के तरीक़ों, जातिप्रथा की कड़वी सच्चाई, राजनीतिज्ञों के जुमलों, सांप्रदायिकता की राजनीति जैसी तमाम रोजमर्रा की बुराइयों पर सरसरी निगाह डालते हुए उपन्यास का तानाबाना बुना गया है।
ऐसा लगता है कि मुकेश को उपन्यास की रिपोर्टिंग करने के लिए ही संतनगर भेजा था जवाहर चौधरी जी ने। संत नगर में इतने किस्से होते हैं उपन्यास का एक पात्र कहता है," इधर सब लोगों का कोई न कोई स्टोरी है। जिसको भी मुँह खोलने को बोलो तो ज़ुबान पे एक स्टोरी तैयार मिलती है। संत चौक का नाम स्टोरी चौक करना चइए।"
               आज के समय को बयान करते हुए चौधरी जी लिखते हैं ," नासमझी को अनदेखा करते रहना आज सबसे बड़ी समझदारी है। दिशा देने को कहा गया है ,"जाही विधि राखें राम,ताहि विधि रहिए।" इस पंक्ति में राम नहीं हैं सरकार है, सरकार मतलब हुज़ूर हैं, साहब हैं। विधि नियम और क़ानून को कहते हैं। इस एक पंक्ति से व्यवस्था या सिस्टम को समझा जा सकता है। महंगाई बढ़ रही हो, नौकरियाँ जा रही हों, मौतें हो रहीं हों, संस्थान बिक रहे हों, लोग दरबदर हो रहे हों तब भी कहीं बेचैनी उजागर नहीं है। अच्छा हो रहा हो या न हो रहा हो आप भक्ति भावना से मज़ा लीजिए, जो भी बुरा हो रहा हो उसे मुर्दों के खाते में डाल दीजिए।

एक समय बात-बात पर प्रधानमंत्री के छप्पन इंच के सीने वाले बयान के मज़े लेते हुए जवाहर चौधरी जी लिखते हैं," नुकती के पहाड़ के दो ढेर देखकर पार्षद-पति मोतीराम शर्मा और बोतल का सीना चौवन और त्रेपन हो रहा है और वे एक राष्ट्रीय रिकार्ड के काफ़ी क़रीब पहुँच गए हैं।"
             धार्मिक कट्टरपंथी लोगों की सोच व्यक्त करते हुए यह संवाद देखिए," ख़ामोश...दो धर्मों के बीच नफ़रत होती है प्रेम कैसे हो सकता है। अगर कोई प्रेम करेगा तो हम करने नहीं देंगे। हम लोगों को जागरूक करेंगे। सच्चा जागरूक व्यक्ति कभी प्रेम नहीं करता है।"
            हिंदू धर्म से दूसरे धर्म में परिवर्तन के कारण पर विचार करते हुए लिखते हैं जवाहर चौधरी," अगर अपने धरम में किसी को लात-जुटे मिलें, जानवरों की सी ज़िंदगी मिले, बासी जूठा खाना पड़े, घर में तख़त-कुर्सी नहीं रख सके, दूल्हा घोड़ी नहीं चढ़ सके न ही मंदिर की सीढ़ियाँ तब तो आदमी धरम बदलेगा ही ना! जिसको खाने को मिल रहा है, इज्जत मिल रही है तो वो धरम उसका है और वो धरम का है।
              कुल 127 पेज के इस उपन्यास में जवाहर चौधरी जी आज के समय की तमाम विसंगतियों पर सरसरी निगाह डालते हुए रोचक अन्दाज़ में व्यंग्य किया है।
उपन्यास के कुछ पंच वाक्य जो पहली पढ़ाई में नोट कर पाया मैं वे यहाँ पेश हैं:

जवाहर चौधरी जी के उपनयस 'संत चौक' के कुछ पंच
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1. विज्ञापन कहते हैं कि ये चीज़ नहीं है अगर आपके पास तो मानों कि आप मनुष्य ही नहीं हैं। पता नहीं चलता कि लोग जीने के लिए मरे जा रहे हैं या विज्ञापनों में समा जाने के लिए।

2.साहब छोटी जात के हैं, इसलिए कुर्सी तभी ग्रहण करते हैं जब सवर्ण सिपाही गस्त पर होते हैं। बाक़ी समय वे बाक़ायदा बेंच शेयर करते हैं या टहलते रहते हैं। अन्यथा न लें इसे आस्था और संस्कार कहते हैं। आप जानते ही हैं कि आस्था हमेशा क़ानून से बड़ी होती है और संस्कार सभ्यता से।

3. बस चलाना हो या देश, न सुनना चलते रहने के लिए ज़रूरी माना जाता है।

4. सरकार किसी काम की नहीं होती। बोतल का वादा करके एक पउवे में वोट ले लेती है कमबख़्त।

5. भाग्य पर भरोसा करने की परम्परा नहीं हो तो इधर क्रांति होने में देर न लगे।

6. लोग संगठित हों तो ड्राइवर-कंडक्टर चाहे देश के ही क्यों न हों, ढीले पड़ जाते हैं।

7. गुंडे बदमास किसके भाई नहीं होते आजकल? दाऊद पूरे देश का भाई है कि नहीं।

8. आज कौन सा ऐसा धंधा है जिसमें चोट्टई नहीं होती है?

9. दुनिया जेबकटों से भरी पड़ी है। कोई छोटा कोई बड़ा, कोई छुपा है कोई उजागर।

10. मुसीबतें कभी अकेले नहीं आतीं हैं, वे प्रायः गठबंधन करके मोर्चा लेती हैं।

11. शरम जान पहचान वालों के बीच आती है, अनजान लोगों के बीच आदमी को सिर्फ़ हिम्मत आती है।

12. साहब को साहब बनाए रखने की ज़िम्मेदारी भी गरीब गुरबों पर ही होती है। जो लोग बस कंडक्टर की घुड़की से गोल हो जाते हों वो साहब के आगे एक ज़रूरी 'चीं' भी निकाल पाएँ इसमें संदेह है।

13. अगवाड़े जितना झक्क-भक्क मेकअप है पिछवाड़े उतनी ही गंदगी है।उस्ताद का कहना है इसी को मार्डन ज़माना कहते हैं।

14. जिसमें खोज की खाज होती है वही अच्छा पत्रकार बनता है।

15. आदमी महान वही होता है जिसके चेले बड़ी संख्या में हों। नाम तब क़ायम रहता है जब नाम लेवा हों।

16. आदमी पैसे के साथ दिक़्क़त कमाता है। कम कमाई कम दिक़्क़त, ज़्यादा कमाई ज़्यादा दिक़्क़त।

17. अव्यवस्था को बनाए रखने का प्रयास ही व्यवस्था है। पहले यह ज़िम्मेदारी धार्मिक पाखंडियों के पास थी, अब राजनीतिक गुंडों के पास भी है।

18. नासमझी को अनदेखा करते रहना आज की सबसे बड़ी समझदारी है।

19. जहां गफ़लत जैसा कुछ होता है वहाँ प्रेम जल्दी फलित होता है।

20. जब 144 लगी हो तो पुलिस से नहीं उलझना चाहिए। ऐसे मौक़ों पर पुलिस डंडा सेवक होती है।

                उपन्यास शायद प्रकाशक द्वारा पुस्तक मेले के मौक़े पर लाने के उद्धेश्य थोड़ा जल्दबाज़ी में छपा है। इसके चलते कुछ वर्तनी की छुटपुट चूक रह गयी हैं।कुल बीस भागों में छपे उपन्यास के हर भाग की शुरुआत में छपे फ़ोटो साफ़ नहीं हैं। बेहतर होता उनको छोड़ ही दिया जाता। आगे की प्रतियों में शायद इसे ठीक किया जा सके।
            
               जवाहर चौधरी जी को उनके इस रोचक उपन्यास के लिए बधाई।

 

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Tuesday, December 3, 2024

एक किताब- जिन्ना: सफलताएँ, विफलताएँ और इतिहास में भूमिका


 


947 का विभाजन भारतीय इतिहास के वे दुखद पन्ने हैं जिन्हें बार-बार पढ़ा जाता है खासकर यह जानने के लिए कि चूक कहाँ हो गई, गलती किससे हुई, विभाजन का खलनायक कौन है । अखंड भारत का सपना हर आँख में पल रहा था। लेकिन जब देश आजाद होने लगा तो अंग्रेजों के शासन में जितना भारत था उसमें से भी दो बड़े हिस्से कट जाएँगे यह किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं था। विभाजन की यह घटना आज भी भारतीयों को टीसती है । इसकी पड़ताल के लिए सामान्य जिज्ञासु भी बार बार मध्यकालीन इतिहास तक पहुँचता है।

1857 की क्रांति के समय अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर तख्त पर थे। जब क्रांतिकारी सैनिक लड़ते हुए दिल्ली पहुँचे तो उन्होंने बहादुर शाह जफर के नेतृत्व में आगे की लड़ाई लड़ी। लड़ाके सैनिकों में हिंदू मुसलमान दोनों थे। औरंगजेब और दूसरे बादशाहों के अच्छे बुरे कामों को भूलकर सारे लोग एक हो गए थे । लेकिन क्रांति को कुचल दिया गया। हजारों  सैनिकों को मौत की सजा दी गई। इस समय सांप्रदायिक सौहार्द अच्छा था। अंग्रेजों से लड़ने के लिए हिंदू और मुसलमान दोनों मिलकर काम कर रहे थे। आजादी की लड़ाई का संघर्ष भी दोनों ने मिलकर शुरू किया। सवाल यही है की दूसरी लड़ाई के बीच ऐसा क्या हुआ कि हिंदू मुस्लिम ही नहीं बँटे बल्कि देश भी बँट गया।
             समय के इन कमजोर लेकिन कठिन दिनों का परीक्षण अनेक विद्वानों और इतिहासकारों ने किया है। प्रोफेसर इश्तियाक अहमद की ताजा किताब 'जिन्ना : हिज सक्सेस, फैलियर्स एंड रोल इन हिस्ट्री' का हिंदी अनुवाद 'जिन्ना : उनकी सफलताएँ, विफलताएँ और इतिहास में भूमिका' एक शोधपूर्ण अध्ययन है। जिन्ना के माध्यम से प्रोफेसर इश्तियाक अहमद ने आजादी के संघर्ष के पूरे कालखंड को देखने का प्रयास किया है। भारत के विभाजन और पाकिस्तान के निर्माण के संबंध में ऐतिहासिक घटनाएँ तो इतिहास के तमाम पन्नों में बिखरी पड़ी है किंतु इस किताब के जरिए पाठक जान पाता है कि वह कौन सी बातें थी जो राष्ट्रवादी कांग्रेसी जिन्ना को विभाजनकारी जिन्ना में बदल देती है।

            जिन्ना 1906 में कांग्रेस के सदस्य बन गए थे और आजादी के संघर्ष में सक्रिय भी थे। गाँधी जी 1915 में अफ्रीका से लौटे और 1919 से कांग्रेस ने उनके नेतृत्व में ब्रिटिश सत्ता को चुनौती देना शुरू किया । किताब बताती है कि जिन्ना को लगता था की गाँधी ने आकर उन्हें किनारे कर दिया है। वे सीनियर थे और अपने को देश का लीडर मान रहे थे। इधर जवाहर लाल नेहरू, सरदार पटेल, बालगंगाघर तिलक आदि भी गाँधी  के साथ जुड़ गए। गाँधी  अपने साथ अफ्रीका में आंदोलन की सफलता लेकर आए थे। गाँधी का कद अचानक बढ़ने लगा और जिन्ना अपने को उपेक्षित समझने लगे। किताब में लिखा है " जाहिर है जिन्ना और गाँधी  के कद के नेता अपने को दूसरे से नंबर दो नहीं मान सकते थे। और दोनों एक ही आंदोलन के प्रमुख नेता नहीं हो सकते थे।.... इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन्ना गाँधी  की छाया में दूसरी पंक्ति का दर्जा स्वीकार करने को तैयार नहीं थे।" धीरे-धीरे जिन्ना में उपेक्षा की भावना गहराती गई। वे मुसलमानों के नेता होते गए और वे गाँधी को हिंदू नेता की तरह देखने लगे। लगता है कि मुस्लिम राष्ट्रवाद के वैचारिक आधार और अलग मुस्लिम राज्यों की माँग में इस मनोवैज्ञानिक स्थिति की भूमिका थी।
           लगभग 700 पृष्ठों में दर्ज जिन्ना को यह पुस्तक खोलती जाती है। इश्तियाक अहमद स्कॉटहोम यूनिवर्सिटी स्वीडन में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं और अनेक शोधपूर्ण किताबों के लेखक हैं । उनका लेखन न केवल पाकिस्तान बल्कि एशिया के अनेक देशों में विद्वानों का ध्यान खींचती रही है । ऐसा लग सकता है कि उन्होंने जिन्ना के पक्ष में लिखा हो। यह कहना होगा कि वे जिन्ना के माध्यम से आजादी के संघर्ष का तटस्थ मनोवैज्ञानिक अध्ययन करते हैं।                

कई जानकारियाँ ऐसी है इस पुस्तक में जो हमें चौंकती हैं। जैसे जिन्ना भारत में संघर्ष के समय द्वि-राष्ट्र की अवधारणा देते हैं। वे अपने भाषणों में कहते हैं कि हिंदू और मुस्लिम दोनों कौमें एक साथ नहीं रह सकती हैं । दोनों की भाषा, तौर-तरीके, संस्कृति, सभ्यता आदि सब अलग-अलग हैं । इस तरह वे दो कौमें नहीं दो राष्ट्र है । और दो राष्ट्रों के लिए एक सामान्य भू भाग नहीं हो सकता। इसलिए विभाजन जरूरी है। लेकिन यही जिन्ना जब पाकिस्तान बन जाता है तो अपने उद्बोधन में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद की बात कहते हैं। जाहिर है जनता को यह बात रास नहीं आती। जो लोग धर्म के आधार पर अलग हुए वे धर्मनिरपेक्षता को कैसे स्वीकार कर सकते हैं। यहाँ मुसलमानों में जिन्ना की लोकप्रियता घटती है । कहा तो यह भी जाता है कि उन्हें पाकिस्तान बनवाने पर पछतावा भी था । जिन्ना का एक और कथित बयान जिसे जावेद उद्धरत करती है वह है -" मैं पाकिस्तान बनाकर सबसे बड़ी गलती की है और मैं दिल्ली जाकर नेहरू से कहना चाहूँगा कि अतीत की मूर्खताओं को भूल जाओ और फिर से दोस्त बन जाओ। " एक और प्रसंग में वह कहते हैं -" आप नहीं जानते कि मैं मुंबई से कितना प्यार करता हूँ । मैं अभी वहाँ वापस जाने के लिए उत्सुक हूँ । "
            यदि आपकी भी जिज्ञासा अपने इतिहास को जानने और कई जटिल प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने में है तो सेतु प्रकाशन द्वारा प्रकाशित यह पुस्तक पढ़ने योग्य है। पेपर बैग संस्करण की कीमत
700 है। अंग्रेजी से पुस्तक का बहुत सुंदर अनुवाद आलोक वाजपेई और अलका वाजपेई ने किया है।


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Tuesday, July 30, 2024

बैंकिंग परिवेश का जीवंत उपन्यास


 


यों देखा जाये तो आज के जीवन में बैंक से हमारा जुड़ाव पहले से कहीं अधिक है। बावजूद इसके कि बैंक के अधिकांश काम अब ऑनलाइन हो गए हैं। बैंक में जाने की जरूरत अब पहले से कम हो चली है। बच्चे बूढ़े, कामवाली बाईयाँ, फेरी वाले, शिक्षित और अशिक्षित सबके पास स्मार्टफोन है। और ज्यादातर लोग ऑनलाइन पेमेंट कर रहे हैं। लेकिन 40 50 साल पहले ऐसा नहीं था। बैंक में प्रवेश करने की हिम्मत सब में नहीं थी। आम आदमी बैंक के दरवाजे पर खड़ा होकर उसके तिलस्म को महसूस करता था। बैंक के अंदर जो चल रहा होता था वह सब को समझ में नहीं आता था। बड़े-बड़े लेजर रजिस्टर, जिन्हें सामान्य तौर पर आम आदमी देख भी नहीं पाता था, उनको उलटते पलटते कर्मचारी अपने आप लोगों की नजर में विशेष हो जाते थे। इस जादुई वातावरण को जानने समझने की जिज्ञासा प्रायः हर एक में होती थी। प्रभाशंकर उपाध्याय जी का उपन्यास 'बहेलिया ' हमारी इन तमाम जिज्ञासाओं को शांत करता है।

प्रभाशंकर जी वरिष्ठ व्यंग्यकार हैं और उनके अनेक व्यंग्य संग्रह, लघु कथा संग्रह, व्यंग कथाएँ और हास्य कथाएँ आदि प्रकाशित है। अपने सार्थक लेखन के लिए वे राजस्थान की अनेक संस्थाओं से पुरस्कृत व सम्मानित हैं । वे बैंक सेवा में रहे हैं और विभिन्न पदों पर रहते हुए उत्तरदायित्व का निर्वाह किया है । बैंकिंग क्षेत्र में उनका सक्रिय अनुभव उपन्यास 'बहेलिया' को समृद्ध करता है। उनके पास कथा कहने का कौशल और एक सरल भाषा है। उपन्यास पढ़ते हुए घटनाएं फिल्म की तरह आँखों के सामने चलती हैं। लगता है आप खुद बैंक की शाखा में बैठे हैं या कर्मचारी हैं या फिर चश्मदीद गावह। पूरे उपन्यास में पाठक अपने आप को बैंक में उपस्थित महसूस करता है। उपन्यास दैनिक डायरी की तरह बैंक की कार्य पद्धति को नोट करता चलता है। अन्य संस्थाओं की तरह यहाँ भी सब तरह के लोग हैं, राजनीति हैं , चालाकियाँ हैं, टाँग खींचने की प्रवृत्तियाँ भी हैं । इन्हीं के बीच यूनियन के नेता हैं जो शह और मात का खेल खेलते रहते हैं। घटनाएँ रोचक और मजेदार हैं। और जैसा कि प्रभाशंकर जी ने लिखा है, ये घटनाएँ सच्ची भी हैं । भाषा सीधी सरल और संप्रेषण योग्य है। बैंकिंग परिवेश से जो जरा भी परिचित है, उसे उपन्यास शुरू से ही पकड़ लेता है।
लेखक ने जो अनुभव जीवन भर नौकरी करते हुए अर्जित किये वह हमें मात्र डेढ़ सौ पेज से प्राप्त हो जाते हैं । लेजर और रजिस्टरों से शुरू हुई बैंकिंग व्यवस्था को प्रभाशंकर जी ने कंप्यूटर युग पर लाकर विराम दिया है। इससे बैंकिंग व्यवस्था के विकास का क्रम भी हमको देखने को मिलता है।
उम्मीद है पुस्तक पढ़ी जाएगी और पाठकों द्वारा पसंद भी की जाएगी।

उपन्यास - बहेलिया
लेखक - प्रभाशंकर उपाध्याय
प्रकाशक - इंक पब्लिकेशन
संस्करण - 2023
मूल्य - ₹250/-

Monday, April 1, 2024

लघुकथाओं का चैतन्य-लोक


 

लघुकथाओं का चैतन्य-लोक

जवाहर चौधरी

“मैडम, धार करने की दुकान का कोई शो-रूम नहीं होता । धार का शोरूम से क्या लेना देना ! ... एक ईंट का टुकड़ा, कुछ पुराने कबेलू , एक-दो टेके के पत्थर और एक चक्का । बस इतने में घर का सारा कोहराम निपट जाता है ।“ चैतन्य त्रिवेदी की ये पंक्तियां साहित्य के शो-रूम और बाज़ार में लघुकथा के मुकाम को रेखांकित करती है । उनकी धारदार लघुकथाओं का तीसरा संग्रह ‘ईश्वर के लिए’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है । इसके पहले उनके दो लघुकथा संग्रह ‘उल्लास’ और ‘कथा की अफवाह’ खासे चर्चित रहे हैं । उल्लास को सन दो हजार में किताबघर प्रकाशन का प्रतिष्ठित ‘आर्य स्मृति सम्मान’ मिला है । उल्लास ने हिंदी लघुकथाओं को एक न्य ट्रेंड दिया है ऐसा माना जाता है । वरिष्ठ रचनाकारों व आलोचकों के इस मत की पुष्टि बाद के दोनों संग्रहों में होती दीखती है ।

ताजा संग्रह ‘ईश्वर के लिए’ में 127 लघुकथाएँ प्रेषित हैं । संख्या की दृष्टि से यह एक बड़ा संग्रह है । वैसे भी चैतन्य त्रिवेदी की रचनायें फटाफट पढ़ते जाने वाली नहीं होती हैं । आकर से वे भले ही लघु हों लेकिन विचार में विस्तार समेटे होती हैं । लघुकथा के सरलीकृत स्वरुप के आदी पाठकों को चैतन्य त्रिवेदी की कथाएं विस्मित करती हैं ।  कई बार इन पर क्लिष्टता के आरोप भी लगते हैं लेकिन जब वे लघुकथा के आशय तक पहुँच जाते हैं तो रचना के सौन्दर्य से प्रभावित हुआ बिना नहीं रहते हैं । एक जगह वे लिखते हैं -  “शब्द को चिरजीवी बनाना चाहते हो तो पाठक को खोजने दो । तुम दर्शन का दृष्टिकोण लिए कोई काम करोगे तो पाठक अपने आप पढ़ कर इस मार्ग पर स्वयं काम करने लगेगा” । (किताब का रास्ता ) । चैतन्य त्रिवेदी की लघुकथाएं कविता की तरह प्रतीकों में बात करती हैं । जैसे “नाव और नदी के बीच कुछ तय हुआ है, ऐसा पता चला है । ... क्या तय हुआ है ? .... सुनने में तो यही आया है कि किनारा तय हुआ है । ... फिर नदी किनारा छोड़ कर चली गयी और समुद्र में जा मिली, और नाव जिस किनारे लगी वह घड़ियाली आंसुओं का मुहाना निकला । एक और रचना की पंक्तियाँ हैं –“वास्तुकार हँसा- जिंदगी में ज्यादा कुछ नहीं चाहिए होता है, बस लौट पड़ने को एक रास्ता और गिर पड़ने को घर के भीतर खुलता कोई दरवाजा “ । यह एक पंक्ति जीवन संघर्ष के विस्तार को व्यक्त कर देती है । सच्चा साथ की एक पंक्ति है – “पत्थरों के साथ ईमानदारी के साथ रहो तो वे धड़कनों के भी सच्चे साथी बन जाते हैं “।   शीर्षक कथा ‘ईश्वर के लिए’ करुणाजनक है । इश्तहार चिपकाने वाले का बच्चा गुम हो गया है । वह बच्चा ढूँढ रहा था और काम देने वाले उसे बार बार जल्दी आने को कह रहे थे । मदद हेतु एक ने उसके बच्चे का फोटो माँगा और गुमशुदा की तलाश का विज्ञापन बना दिया । अब वह दूसरे इश्तहारों के साथ इसे भी चिपकाने लगा । इस दौरान सूचना मिली कि बच्चे की लावारिस लाश देखि गयी है । यह उसके बच्चे की ही लाश थी । वह बिलख उठा, उसने पास के बड़े से पत्थर पर गुमशुदा बच्चे वाला इश्तहार चिपका दिया । लोगों ने कहा इसका क्या मतलब अब ! बच्चा तो मर चुका है । वह बोला –यह ईश्वर के लिए है ।“यहाँ चैतन्य पाठक को उस भरोसे की ओर ले जाते हैं जिसके सहारे आदमी का संघर्ष और अस्तित्व बचा हुआ है ।

एक लघुकथा (विमर्श का तथ्य)  बौद्धिक चिंतन और विमर्श को निशाने पर लेती है । प्रबुद्धजन और चिन्तक खाते पीते हुए लोकतंत्र, संस्कृति, मूल्य और नैतिकता की बहस पर लगे हुआ हैं और पास एक भूखा कुछ पा जाने की प्रतीक्षा में खड़ा है । विद्जनों ने उसे कुछ खाना देने का आश्वासन दिया है । लेकिन उसे कुछ मिल नहीं पाता है । चर्चा से उकताया वह कहता है – “सर, मैं तो सिर्फ इतना कहने आया हूँ कि मेरी भूख मर गयी है” ।  चैतन्य की लघुकथाओं में व्यंग्य भरपूर है जिसे उन्होंने सलीके से वापरा है । उनके व्यंग्य की धार लघुकथाओं की पहुँच सुगम बना देती है ।

मानवीय संवेदनायें और संबंधों की बारीक बुनावट और समझ उनकी कई लघुकथाओं में दिखाई देती है । “घर के लोग मायूस खड़े थे । आदमी किस्मत के चलते दवाइयों पर जिन्दा रहने की कोशिश में ..... उस शाम डाक्टर जब राउंड पर आए तो मरीज ने कहा – अब घर चले जाना चाहता हूँ । यहाँ पड़े रहने से क्या फायदा ! क्या महिना भर क्या हफ्ता, जाना ही तो है अब । वह अपने घर में, और अपने में रहने का यह आखरी मौका गंवाना नहीं चाहता ।“ डाक्टर का कहना था कि जिंदगी के ये शेष रहे दिन  अस्पताल के दम पर हो निकालेंगे । यहाँ हम लोग हैं , कैसी भी ऊंच नीच में दौड़े चले आएंगे । मरीज कहता है – अरे सिर्फ एक-डेढ़ महीने के लिए आप इतनी जहमत क्यों उठाते हो ! सत्तर बहत्तर का हो गया हूँ । जितना जिया अब तक अपने दम पर जिया । फिर कुछ दिनों के वास्ते अपने दम पर जिए आदमी के लिए यह अस्पताल क्या दम मार लेगा ! ” ( अस्पताल क्या दम मार लेंगे ! ) यहाँ लेखक ने जीवन के अंतिम समय की उलझन को बहुत आसानी से सुलझाने का प्रयास किया है । अस्पताल में महीने पंद्रह दिनों के लिए अपनी मट्टीपलीत कराते और बावजूद इसके भगवान से मौत मांगते मरीजों को किसने नहीं देखा होगा ।                                          चैतन्य त्रिवेदी अपने समकाल को निर्भीकता से व्यक्त करते हैं । लेखक में ईमानदारी और साहस आज समय और साहित्य की जरूरत है । यदि रचनाकार क्रूरता व विसंगतियों का सामना नहीं करेंगे तो और कौन करेगा । नमूने की ये पंक्तियाँ - “कुछ लोग शहर में ईश्वर का काम करते हैं । वे सब अपनी अपनी तरह से अपने ईश्वर को दूसरों के ईश्वर से अलग बनाये रखने की कोशिश में लगे मिलते  हैं  । उन्हें या तो अपने लोगों पर संदेह है कि कहीं ये लोग दूसरों के ईश्वर की तरफ न चले जाएँ । या फिर उस ईश्वर पर संदेह है कि कहीं वो एक न हो जाएँ । कई बार तो यह लगने लगता है कि वे जो जानते हैं , इतना तो ईश्वर भी अपने बारे में नहीं जनता होगा । उन्होंने ईश्वर को आदत बना लिया, समझ की तरह ।”  (प्रतीक्षारत )

लघुकथा इनदिनों साहित्य की लोकप्रिय विधा हो गयी है । बहुत लिखा जा रहा है । किन्तु चैतन्य त्रिवेदी की लाघुकथाओं से गुजरना, गुजरना नहीं ठहरना होता है । उनकी रचनाएँ घटना प्रधान नहीं होती हैं । वे अपनी रचनाओं में चाबी देते हैं, ताला आपको खोलना होता है । इसमें कोई संदेह नहीं कि लघुकथा साहित्य में यह किताब दिशादर्शन का महत्त्व रखेगी ।

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पुस्तक – ईश्वर के लिए /  

लेखक – चैतन्य त्रिवेदी

प्रथम संस्करण – 2023 / 

प्रकाशक –प्रलेक प्रकाशन, मुंबई  

मूल्य – रु. 249 -


Monday, December 4, 2023

चिल्लाओ मत, सब जाग चुके हैं !


 

परेशान चित्रगुप्त कर्मचारियों पर झल्ला रहे थे । जीव-गोदाम से अनेक जीव गायब पाए गए हैं । उनमें सबसे महत्वपूर्ण परसाई का जीव भी दिखाई नहीं दे रहा है । कुछ दिन स्टॉक चेक नहीं करो तो ऐसी गड़बड़ी होती है । मृत्युलोक कहने भर को ही देवभूमि है । वहां आते जाते सारे यमदूत भ्रष्ट हो गए हैं वरना इतनी बड़ी गलती कैसे हो सकती है ! रजिस्टर में साफ साफ इंट्री है परसाई का जीव १० अगस्त १९९५ को यहाँ लाया गया था । जाँच के बाद पाया गया कि इस जीव को दोबारा धरती पर भेजना उचित नहीं है इसलिए ‘नॉट फॉर रीसायकल’ केटेगरी में, ताले में बंद करके रखा गया था । लेकिन अब कहाँ हैं किसी को नहीं मालूम । यमदूतों की लापरवाही दिनोंदिन बढ़ती जा रही है । एक बार भोलाराम के जीव को भी ये लोग समय पर नहीं ला पाए थे । कितनी बदनामी हुई थी डिपार्टमेंट की । अभी तक धरती वाले इसे मुद्दा बना कर नाटक खेलते हैं । उस समय तो मिडिया-मंडी नहीं थी । राजा हो या मंत्री कोई इस तरह बिकता नहीं था । पैसे वाले गधे-घोड़े ही खरीदते थे । अख़बारों की खबरें भी खबरें ही हुआ करती थीं । आज अगर स्वर्ग नरक का डाटा लीक हो जाये तो नीचे ब्रेकिंग न्यूज़ से टीआरपी बढ़ा लेंगे लोग ।

“ए मिस्टर इधर आओ, तुम कैसे एमबीए हो !! वेयर हॉउस का साधारण सा काम भी ठीक से नहीं होता है तुमसे ! मुझे लगा था कि प्रथम श्रेणी की डिग्री है तो उसके लायक भी होगे । लेकिन तुम्हारे जैसा लापरवाह, नाकारा गोदाम चौकीदार पूरी धरती पर भी नहीं मिलेगा । मुझसे गलती हुई जो मैंने तुम्हारी डिग्री पर भरोसा किया । लगता है तुमने भी नकली डिग्री बनवा रखी है ! दूत हो, कम से कम तुम्हें तो शरम आना चाहिए ।“ चित्रगुप्त क्रोधित हुए । 

“सर आप बड़े हैं, शिक्षा व्यवस्था को कुछ भी कह सकते हैं । राग दरबारी वाले व्यंग्यकार के जीव ने आपको बता दिया होगा कि शिक्षा व्यवस्था सड़क किनारे पड़ी कुतिया है और बड़ा छोटा कोई भी उसे लात मार कर चल देता है । गलती किसकी है, चूक कहाँ हुई इसकी जाँच किये बिना आपने मेरी डिग्री पर संदेह किया । मेरे लिए तो इतने में ही डूब मरने की बात है ।“  यमदूत दुखी हुआ ।

“शिक्षा व्यवस्था में जो चल रहा है वो भी डूब मरने की बात है । लेकिन कोई मरा आजतक ?! मैं तुम्हारी जिम्मेदारी की बात कर रहा हूँ । आखिर गायब कैसे हुआ व्यंग्यकार  का जीव ? जानते हो अगर वह कहीं पैदा हो गया तो उसका भी ‘हे राम’ हो जायेगा ।” चित्रगुप्त चिंतित भी हुए ।

“क्षमा करें श्रीमान, लाखों जीवों का आवगमन होता है यहाँ से । बत्तीस करोड़ का देश पचहत्तर वर्ष में एक सौ चालीस करोड़ का हो गया । आप जरा वर्क लोड देखिये । कम्पूटर नहीं है, स्टाफ भी उतना का उतना ही है । हर तीन सेकेण्ड में दो जीव भारत के लिए ही डिस्पेच करना पड़ते हैं । अगर कीड़े मकोड़ों के जीव न हों तो हमें आपूर्ति करने में पुरखे याद आ जाएँ । इधर भभ्भड़ मचा रहता है और उधर लोग जश्न मना रहे हैं कि दुनिया में नंबर वन हो गए !! सुना है ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए उकसाया भी जा रहा है ! पैदाइश-युद्ध पर उतर आये हैं लोग !” दूत ने अपनी बात रखी ।

“उनकी मूर्खताओं को बता कर तुम अपनी गलती नहीं छुपा सकते दूत । व्यंग्यकार का जीव कोई मामूली जीव नहीं है, फ़ौरन ढूंढो उसे ।“

“चाँद पर देखता हूँ । इन्स्पेक्टर मातादीन वहीं पड़ा होगा । हो सकता है व्यंग्यकार का जीव उससे मिलने पहुंचा हो ।“

“ हमारे पास केवल देवभूमि का ठेका है । जाओ वहीं किसी वैष्णव की होटल में देखो । सारे जीव उधर ही फिसलते हैं ।”

यमदूत धरती पर पहुंचा । किसीने कहा कि राजधानी की ओर जाओ । व्यंग्यकारों की कलम इनदिनों सरकार के नाक-कान छेदन में लगी है । हो सकता है वहाँ मिल जाये ।

कुछ देर में ही यमदूत की नजर एक भीड़ पर पड़ी । व्यंग्यकार का जीव मालिक-भक्तों से घिरा हुआ था । बिना ठोस शरीर की आकृति को लोग भौंचक से देख रहे थे । एक आवाज आई, -- अरे इनको तो पहचानता हूँ मैं ! ... क्यों तुम वही हो ना ?”

“हाँ मैं वही हूँ, और देख रहा हूँ तुम भी वही हो ।“  जीव ने बिना मुस्कराए कहा ।

 “तुम तो हर समय टांग खींचते थे ! अब देखो, देखो कितना विकास हो गया है ! कितने सारे हवाई अड्डे, कितनी सारी उड़ानें, रेलें सुपरफ़ास्ट, सड़कें देखो एक सौ पचास की स्पीड में दौड़तीं कारें, बड़ी बड़ी मूर्तियाँ, बड़े बड़े देव, बड़े बड़े अवतारी, बड़ी पूजाएँ, बड़े पुजारी, बड़ा बजट । टीवी देखो, अख़बार देखो सरकार ही सरकार देखो । मालिक का विमान साढ़े आठ हजार करोड़ देखो और विपक्ष के पेट में लाइलाज मरोड़ देखो । ...  कैसा लग रहा है ? ... खुश नहीं हुए ना !?”

“अच्छा तो सब अमीरों के लिए है ! विकास कम हवस ज्यादा है !! अमीर कितना उड़ेंगे, कितनी कार दौड़ाएँगे, कितना पूजेंगे भगवान को ! अमीर मालिक हो गए देश के ! उन्होंने सिस्टम को टम टम बना लिया है अपना ! “ जीव बोला ।

“दोस्ती में कोई मालिक नहीं कोई टम टम नहीं । सारे प्रगतिशील हैं ।“

“ओह ! प्रगतिशील हैं !! दाढ़ी रखने से प्रगतिशील हो जाते हैं क्या !  बुद्धिजीवी कौन होते हैं समझते हो ?“

“हाँ हाँ, पता है । ... समस्या होते हैं ।“

“औंधी खोपड़ी हो अभी तक ! समाधान को समस्या कहते हो !?”

“हम जिसे समस्या मानते हैं वो समस्या है । और विकास पथ में बुद्धि या बुद्धिजीवियों का कोई काम नहीं है ! ताली-थाली बजवा कर चेक कर लिया है मालिक ने । बुद्धिजीवी व्यवस्था के शत्रु होते है । दीर्धकालिक योजना से इन्हें नष्ट किया जाना है । बुद्धिजीवी मुक्त भारत ! कितना सुन्दर होगा ! मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम करेंगे इनका समूल नाश ।“

“लोकतंत्र की छड़ी जनता के पास होती है । और उसकी मार में आवाज नहीं होती है ।“ जीव ने याद दिलाया । 

“लोकतंत्र का पाठ कोर्स से हटा दिया गया है ? जब नयी पीढ़ी पढेगी नहीं तो जानेगी कैसे ! जब प्रजा को एक ही पार्टी, एक ही मालिक को चुनना है तो चुनाव और लोकतंत्र की जरुरत क्या है !” मालिक-भक्त बोला ।

“लोग मूर्ख हैं ! दूसरी पार्टी और नेता के बारे में नहीं सोचेंगे ।“ जीव ने कहा ।

“जो सोचेगा देशद्रोही माना जायेगा । जरुरत पड़ी तो नए कानून और नयी जेलें बनायीं जाएँगी ।“

“तो गरीब के ही वोट नहीं लोगे ! ... गरीब के लिए कुछ किया है ?”

“गरीबी हटा दी गयी है । मीडिया में एक भी शब्द गरीब के बारे में नहीं मिलेगा ।... मालिक ने गरीब को दूसरा सम्मानजनक नाम ‘भूमिपुत्र’ दिया है । अब गरीब भूमिपुत्र है ।“

 “इससे उनके हालात तो बदलेंगे नहीं !  क्या गरीबों को मालूम है कि उन्हें भूमिपुत्र कहा जा रहा है ?”

“हाँ उन्हें मालूम है और वे बहुत खुश हैं । भड़काने वाले न हों तो गरीब जरा से में राजी रहते हैं ।  उन्हें पहली बार सम्मान मिला है । सम्मान मिल जाये तो वे आधी मजदूरी से खुश हो जाते हैं, मजे में भूखे भी रह लेते हैं ।  जुमले हमेशा फर्टीलाइजर का काम करते हैं । मालिक जब कहते हैं कि ‘मित्रो मैं भी भूमिपुत्र था’ तो फसल दूनी उगने लगती है वोटों की । लोकतंत्र की रक्षा का मतलब वोटों की रक्षा ही तो है । देशभक्त सुनहरे कल की ओर बढ़ रहे हैं । “

“बड़े होशोयर हो ! महंगाई का ‘म’ भी नहीं बोल रहे हो !! रुपया लुढ़क रहा है !” जीव को गुस्सा आने लगा ।

“रुपया वहीं है डालर उछल रहा है । डालर हमारी समस्या नहीं है । और महंगाई कहाँ है !? अगर महसूस नहीं करो तो महंगाई है ही नहीं । महंगाई तो एक भ्रम है जो राष्ट्रद्रोहियों ने फैला रखा है । जो प्याज नहीं खाता उसके लिए प्याज महँगी नहीं है । जो भी महंगा लगे वो मत खाओ । जिसे तुम महंगाई समझ रहे हो दरअसल वो विकास है ।  विकास गर्व की बात है । रही भूमिपुत्रों की बात तो उन्हें इतना अनाज मुफ्त दिया जा रहा है जितने में वो हर चुनाव तक जिन्दा रह लें ।“

“रोजगार का क्या ? चुनाव के बाद उन्हें भूख नहीं लगेगी ?”

“बता दिया है उन्हें । हानि-लाभ, जीवन-मरण, जस-अपजस विधि हाथ । यह ईश्वरीय नियम है, इससे ऊपर कोई जा सकता है ?“

“भ्रष्टाचार करने वाले तो साधु हो गए ?! चौतरफा ईमानदारी फल फूल रही है !”

“अरे, ... भूल गए ! ... ‘सदाचार का ताबीज’ । तुमने ही तो बताया था कभी । पूरे एक सौ चालीस करोड़ भाइयों और बहनों के लिए बनवाये जा रहे हैं । दोस्तों को ठेका दे दिया गया है ।  मुफ्त मिलेंगे सबको । विपक्ष बहुत बोलता है उसको एक बूस्टर तावीज भी बांधा जायेगा ।“

“झूठ की रेत में सिर घुसा लोगे तो क्या दिखोगे नहीं किसीको !?” जीव ने फटकारा ।

तभी एक और भड़कती आवाज आई, बोला – कौन हो जी तुम !? क्या उलजलूल सवाल पूछे जा रहे हो ! लगता है लाल वाले हो । तुम ऐसे नहीं सुधरोगे । ... ये जागरण का समय है रे, जागो-जागो । नगर नगर जागो, डगर डगर जागो । कस्बे, गाँव और टोले जागो । उठो जागो कि समय आ गया है उत्तर देने का ।“

“चिल्लाओ मत, सब जाग चुके हैं । और उन्हें पता है कि समय आ गया है उत्तर देने का ।“ जीव ने भी चिल्ला कर जवाब दिया ।

भीड़ में गुस्सा बढ़ने लगा । जीव के साथ शरीर होता तो पक्के में इस बार मॉब-लीचिंग होती या इंकाउंटर जैसा कुछ । मौका देख कर दूत जीव को दबोचा और यमलोक की ओर उड़ गया ।

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