
आलेख
जवाहर चौधरी
केदारनाथ में आए प्रलय और उसके बाद के घटनाक्रम ने हर संवेदनशील मन को
विचलित कर दिया है। हम मानते हैं कि ईश्वर अपनी शरण में आए हुओं की रक्षा करता है।
हमारी शिक्षा और संस्कार कहते हैं कि ‘‘डरो नहीं, क्योंकि
तुम्हारे साथ ईश्वर है’’। ईश्वर कहता
है “मेरी शरण में आओ”. किन्तु समाचार हैं कि अनेक लोग मंदिर के
अंदर, ईश्वर की लगभग गोद में थे
किन्तु उन्हें कोई बचा नहीं पाया!!
प्रलय जैसी घटनाओं से मनुष्य को जितनी हानि होती है शायद उससे कहीं अधिक
हानि ईश्वर को होती है। एक घटना से सर्वशक्तिमान संदेह में आ जाता है और भक्त उसकी
उपेक्षा करते दिखने लगते हैं। एक रात में ही भक्त ईश्वर के भय से अपने को मुक्त कर
लेता है और उसके आंगन में, उसके
ही धन को ले उड़ता है!! मंदिर की दानपेटियां मौका मिलते ही तोड़ी और लूटी जा चुकी
हैं! आस्था रखने वाला समाज जिन्हें साधु-संयासी कहता बिछा-बिछा रहता है, आज वह देख रहा है कि उनके झोले से लूट के
लाखों रुपए और आभूषण निकल रहे हैं!! मौके का पाशविक लाभ लेते हुए तमाम लोग लाशों से
चांदी-सोने के आभूषण लूटने में लगे रहे!! केदारनाथ मंदिर के पास स्थित बैंक से
सारा पैसा लूट लिया गया! पता चला है कि बैंक में पांच करोड़ से अधिक रुपए थे।
प्रश्न यह उठता है कि एक तीर्थ-स्थल यानी धर्मक्षेत्र में अचानक यह पाशविकता
कैसे पनप गई ! माना जाता है कि वहां तो पशु-पक्षी भी आस्थावान होते हैं। स्थानीय
लोग भी सेवादार होते हैं! कहते हैं कि अनेक हताश, निराश, असफल, कुकर्मी, अपराधी किस्म के लम्पट धर्म की ओट ले कर अपना
अज्ञातवास काट रहे होते हैं। उनमें ईश्वर के प्रति न भक्ति होती है न आस्था। आम दिनों
में निडर वे ठगी आदि करते हैं और मौका मिलते ही लूटपाट करने से नहीं चूकते हैं।
इनकी पहचान कौन करेगा ? निश्चित ही
ईश्वर तो नहीं। अगर ईश्वर कर सकता तो अपने भक्तों को मृत्यु नहीं देता जो मोक्ष की
कामना से आसिस लेने आए थे। हाल ही में प्रयाग के कुम्भ मेले में लाखों साधु आए और
भक्तों ने उनके दर्शन किए। सुनते हैं कि वे वहीं कहीं पहाड़ों में निवास करते हैं।
माना जाता है कि चमत्कारी होते हैं, इनके पास शक्तियां-सिद्धियां होती हैं। भक्तों पर या धर्मावलंबियों पर
संकट आता है तो वे मार्गदर्शन करते हैं। किन्तु दुःख है कि प्रलय के बाद कोई
साधुदल या अखाड़ा बचाव कार्य में सहयोग करता दिखाई नहीं दिया! जो भी मदद मिली वो
सेना के जवानों और सरकार से मिली। सेना ही थी जिससे लूटेरे डर रहे थे और उनके ही द्वारा
पकड़े भी गए। यदि सेना के जवान नहीं होते तो लुटेरों की बन पड़ती और कोई आश्चर्य नहीं कि लूट के लिए हत्याओं की खबरें भी आतीं ।
लेकिन जो लौटें हैं वे ईश्वर का ही आभार मान रहे हैं। पूजा-पाठ, कथा-भागवत सब निरंतर रहने वाली हैं। इसके
अलावा शायद हमारे पास कोई विकल्प भी नहीं है। रोटी की तरह ईश्वर भी हमारी जरूरत
है। जब तक हम रहेंगे, चाहे कितने
भी प्रलय आएं, चाहे जितनी भी पाशविकता
हो, ईश्वर को मानते रहेंगे। एक
व्यवस्था है जो सांसों की तरह चल रही है, और उसका चलाने वाला कौन है हम नहीं जानते हैं।
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