Thursday, February 16, 2017

बिन गुरु ज्ञान न उपजै, गुरु बिन मिलै न मोक्ष

गुरुदेवों में सबसे पहले दीक्षित जी याद आते हैं, उम्र कोई चालीस पैंतालीस, कद काठी के मजबूत, देखने में सौम्य, रंग खूब गोरा कि अंग्रेज होने का भ्रम होता था, समय के पाबंद भी इतने कि समझ में नहीं आता था कि वे घड़ी से चलते हैं या घड़ी उनसे. सख्ती के मामले में किसी कसाई से कम नहीं थे, ठुकाई-पिटाई में उनका विश्वास उस काल के गुरुओं के अनुरूप था. घरों में ट्यूशन लगाने का चलन हो गया था. तो दीक्षित जी ट्यूशन पढाने आया करते थे. मै और मेरा भाई, यूँ समझिए कि न पढ़ने पर आमादा थे. स्कूल में मस्ती और उसके बाद पूरी आजादी के साथ मस्ती. जहाँ हमारा घर है उसे नवलखा कहा जाता है, लोग कहते हैं कि राजे रजवाडों के समय इस क्षेत्र में नौ लाख पेड़ हुआ करते थे. चारों तरफ प्राकृतिक वातावरण, जैसा कि आजकल फिल्मों में भी कम दिखाया जाता है. घर में पूजा-पाठ और ईश्वर पर आस्था का माहौल था. दीक्षित जी ढेर सारा होमवर्क देते थे जो हम प्रायः नहीं करते थे. शुरू शुरू में उन्होंने रूटीन की डांट -फटकर और थप्पड़ों से काम चलाया लेकिन जल्द ही मामले को दिल पर लेने लगे. देखने में उनके गोरे हाथ, लाली लिए हुए, बहुत कोमल और सुन्दर दीखते थे, लेकिन जब मारते थे तो लगता था कोई तीसरा हाथ भी है उनके पास. वे सजा देने की ऐसे ऐसे तरीके अपनाने लगे कि मुझे अब लगता है यदि वेसाइंस पढ़े होते तो उनके नाम कई अविष्कार अवश्य दर्ज होते. जब मारपीट का असर नहीं हुआ तो उन्होंने मुर्गा बनाने का संकल्प ले लिया. लेकिन जल्द ही मुर्गा बनने में हम दक्ष हो लिए. दस-पन्द्रह मिनिट में उनका धैर्य टूट जाता लेकिन हमारी हिम्मत कायम रहती. वे किसी दिन एक टांग पर खड़ा करते, कभी उठक बैठक आजमाते. डेढ़ महीने में वे मल्टीटास्क नीति अपनाने लगे. अब वे पढाने वाले गुरु कम फिजियोथेरेपिस्ट ज्यादा लगते थे. लेकिन बच्चे तो बच्चे होते हैं जी, कब तक दम भरते आखिर. घंटा भर की फिजियोथेरेपी भारी पडने लगी तो जवाबी कार्रवाई में उनके आते ही शौचालय में बंद हो कर अपनी रक्षा की. सोचा था यह एक दीर्ध कालीन योजना होगी किन्तु तीन चार दिनों बाद ही ये युक्ति बेअसर कर दी गई. आखिर जैसा कि अक्सर होता है, जब कहीं सम्भावना नहीं होती तो लोग ईश्वर की शरण हो लेते हैं. पता नहीं क्यों मुझे ईश्वर में बड़ा विश्वास था. मैंने ईश्वर के पास जा कर प्रार्थना की कि भगवान आज दीक्षित जी ना आयें. ठीक साढ़े चार बजे वे आ जाते थे, पौने पांच हो गए ! पांच हो गए, और उस दिन वे नहीं आये. अब हाल ये कि मेरे तो बस भगवानजी दूसरों न कोई . जैसे तुरुप का इक्का हाथ लग गया. दूसरे दिन साढ़े चार बजे फिर वही प्रार्थना. और उस दिन भी दीक्षित जी के दर्शन नहीं हुए. उत्साह में जबरदस्त इजाफा, मन में जो डर था वो गायब हुआ सा लगने लगा. तीसरे दिन भी साढ़े चार बजे और इधर प्रार्थना का शक्ति परिक्षण शुरू हुआ. लेकिन ये क्या !! दीक्षित जी हाजिर थे ! ईश्वर का ये मजाक मुझे पसंद नहीं आया. भगवान से कुछ नाराजी व्यक्त करते हुए आखिर कसाईवाडे में समर्पित होना पड़ा. दीक्षित जी ने दो दिन की कसर भी पूरी कर ली. उसके बाद कुछ रोज तक प्रार्थनाएं हुईं और जैसा कि होना था ईश्वर पर से मेरा विश्वास उठ गया.
बहुत समय बाद एक गुरुदेव मिसिर जी उत्तर प्रदेश से हमारे घर आये. नवलखा में ही एक सरकारी कालेज है, वहाँ उनकी नौकरी लगी थी, प्रोफ़ेसर हो कर आये थे. हमारा बड़ा परिवार, खूब जगह, आसपास खेत-बगीचे, रहने के लिए कई कमरे, बहुत से खाली, उन दिनों किराये से देने का चलन नहीं था. गुरुदेव ब्राह्मण, सो पूज्य भी. तीस-पैंतीस की उम्र, विनय पूर्वक उन्हें स्थान दिया, वे साथ ही रहने लगे. तीन घंटे कालेज में रह कर लौट आते. एक बड़ा कुँआ था जिस पर सुबह नहाते वे एक मन्त्र सा बोला करते थे  बम्म गौरा टन्न गणेश- पादे गौरा हँसे गणेश. सुन कर हम हँसते. उनके प्रोफ़ेसर होने का खौफ शीघ्र खत्म हो गया. मै मिडिल स्कूल पास हो गया था. गुरुदेव के साथ शतरंज खेलते, चर्चा करते दिन गुजर जाता.  हमारे घर में कुछ किताबें थीं, कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी, प्रेमचंद आदि की और चंद्रकांता संतति वगैरह भी जिन्हें थोड़ा बहुत पढ़ने का मौका मिल रहा था. मिसिरजी ने मेरी रूचि जान कर महेंद्र भल्ला एक उपन्यास दिया भोली-भाली. भारत-पाकिस्तान सीमा पर एक लड़की अनजाने में सीमा पर कर जाती है और लगातार मुसीबतों में पड़ती है. रोमांचक कहानी थी, हाल में हमने सबरजीत प्रसंग के रूप में इसे देखा है. भल्ला का उपन्यास दूसरी तरफ भी साप्ताहिक हिंदुस्तान में पढ़ा जो विदेशी जमीन पर भारतियों की स्थिति का चित्रण करता है. स्कूल में वार्षिक पत्रिका निकाली जाना थी. छात्रों से रचनाएँ आमंत्रित की गईं थीं. मिसिरजी से कहा कि कुछ बताएं कि कैसे लिखूं, कोई कविता या कोई लेख, कहानी कुछ. उन्होंने कुछ लिखवाया जो जमा नहीं. रचना देने की अंतिम तिथि पास आ रही थी तो किसी कालेज की पत्रिका देते हुए बोले ये लो इसमें से ये दो पेज की कहानी अपने हाथ से लिख कर देदो. उन्होंने बताया कि यह पत्रिका उत्तर प्रदेश की है, यहाँ कोई जान नहीं पायेगा, पूछे तो कहना कि मैंने ही लिखी है. कहानी मैंने जमा कर दी. कुछ दिनों बाद क्लास टीचर ने चलती कक्षा में पूछा कि ये कहानी तुमने लिखी है !? ये मजुमदार सर थे, और सख्त मिजाज थे. मैं डरा, लेकिन कहा कि जी हाँ मैंने लिखी है. इधर आओ, उनका आदेश हुआ. मुझे लगा चोरी पकड़ी गई है, अब शायद पिटाई भी हो सकती है. अपमान का डर, घिघ्घी सी बांध गई. बदन कांप रहा था. लेकिन पास गया तो उन्होंने शाबाशी दी, खूब पीठ ठोकी. लड़कों को कहा कि देखो इस लडके को. इसने इतनी अच्छी कहानी लिखी है. बोले बेटा तुममे बहुत प्रतिभा है. इसी तरह से लिखते रहो. एक दिन तुम बड़े लेखक बनोगे और अपने स्कूल का नाम रौशन करोगे. अब मेरे लिए एक विचित्र अनुभव की स्थिति थी. सच बोलना संभव नहीं था, उतने ही भारी पड़ रहे थे मजुमदार सर के आसीस. दीक्षित जी वाले प्रसंग के बाद पहली बार मुझे भगवान याद आने लगे. सिर झुकाए देख वे और प्रभावित हुए, बोले तुम बहुत विनम्र भी हो, ये अच्छी निशानी है. शाबाश, जाओ, बैठो .
शाम को मैंने यह बात ग्लानी के साथ मिसिर जी को बताई. वे खूब हँसे. बोले –“ ये बढ़िया हुआ. अब कोई कुछ नहीं बोलेगा.... देखो दुनिया ऐसे ही चलती है.
यों तो बात आई गई हो गई. लेकिन सख्त मिजाज मजुमदार सर जब भी मुझे देखते मुस्करा देते. उनकी मुस्कराहट से बचने के लिए मै कोशिश करता कि सामने ना पडूँ. लेकिन मौका आ ही  जाता. एक चोर अंदर ही अंदर मुझे खाए जा रहा था. आखिर एक दिन पत्रिका प्रकाशित हुई और मैंने उसे छुपा लिया, किसी को दिखाया नहीं. मिसिर जी को भी नहीं. वे भूल गए थे, लेकिन मैं नहीं भूल पा रहा था. मन में एक अपराध बोध घर कर गया था. मन बहुत होता कि कोई कहानी खुद लिखूं और चोरी के इस बोझ को उतर दूँ . पढ़ने के शौक में एक  बार मुझे पर्ल बक की किताब हाथ लगी. डायरी की तरह लिखी यह किताब मुझे अच्छी लगी और मैं भी डायरी लिखने लगा. पता नहीं चला कि शब्द कब डायरी से निकल कर रचनाओं में बदलने लगे. जो भी हुआ, आज मैं अपने गुरुदेवों को खूब याद करता हूँ .
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