बुधवार, 8 फरवरी 2012

परंपराओं की बिल्ली


                पुराने समय में एक पंड़ितजी जब पूजा करने बैठते तो उनकी पालतू बिल्ली उनके आपपास बनी रहती, कभी गोद में बैठ जाती, कभी पूजा सामग्री की ओर लपकती । पंड़ितजी पूजा पर बैठते और पहले एक टोकरी से बिल्ली को ढंक देते । बिल्ली बंद रहती और उनकी पूजा निर्बाध संपन्न हो जाती । अचानक उनका देहांत हो गया । कुछ दिनों के बाद पूजा पुनः आरंभ करना थी । पुत्र ने बड़े परिश्रम से बिल्ली को पकड़ा , टोकरी में बंद किया और पूजा की । हर दिन पूजा से ज्यादा समय उसे बिल्ली को पकड़ने में लगाना पड़ता था क्योंकि बिल्ली उसे देखते ही दूर भागती थी । 
                कोई कार्य रूढ़ हो कर कब हमारी चेतना में  जगह बना लेता है , अक्सर हम जान नहीं पाते । विवेक और विज्ञान को अपनी शक्ति  का ज्यादातर भाग पिछले कामों को देखने-समझने और जांचने में खर्च करना पड़ता है । भारत में एक सामान्य परंपरा है कि जब किसी की मृत्यु होती है तो दरवाजे पर कंडे या उपले को जला कर रख दिया जाता है । शवयात्रा के साथ आगे आगे उस जलते उपले को ले कर चला जाता है । उस उपले से बड़े प्रयासों के बाद चिता की अग्नि प्रज्वलित की जाती है । नगरों / महानगरों में भी यही किया जाता है । इसके कारणों के विषय में कहीं कोई जिज्ञासा या प्रश्न  नहीं होता है ।
                  पुराने समय में ‘आग’ माचिस में सुलभ नहीं थी । बड़े परिश्रम और जतन से उसे ‘पैदा’ किया जाता था । रसोई बनाने के बाद चूल्हे में अंगारों को दबा कर रखा जाता था ताकि जरूरत पड़ने पर दोबारा उसी से ‘आग’ पैदा की जा सके । इस तरह चूल्हा हमेशा  आग समेटे गरम रहता था । घर में किसी की मृत्यु होते ही परिजन चूल्हे से आग निकाल कर उपले के साथ दरवाजे पर रख देते थे । चूल्हा ठंडा हो जाता था । ‘चूल्हा ठंडा होना’  शोक सूचक शब्दों  की तरह प्रयुक्त होते थे । शोक  प्रायः तीन दिन, तेरह दिन और कहीं कहीं सवा महीना या चालीस दिनों का होता है । तीन दिनों तक घर का चूल्हा नहीं जलता था । पास पड़ौस या संबंधीजनों के यहां से उपलब्ध कराए भोजन का उपयोग होता है । बाद में बहन-बेटियां और रिश्तेदार  घर का चूल्हा जलवाते थे । ‘चूल्हा जलवाना’ शोक  निवारण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया माना जाता था । अब चूल्हे में पहले की तरह ‘आग’ है , वह गरम है अर्थात् जीवन की सामान्य गतिविधियां पुनःस्थापित हो गईं ऐसा माना जाता था । 
                 आज के समय को देखें तो अग्नि को प्रज्वलित करने में कोई कठिनाई नहीं है । न ही घरों में परंपरागत चूल्हे दिखाई देते हैं , कम से कम नगरों में तो नहीं । गांवों में हैं भी तो उन्हें गरम रखने की आवश्यकता  अब समाप्त हो चुकी है । लोग कुकिंग गैस या बिजली से भोजन पकाते हैं । शिक्षा , समझ और आधुनिकता के मामले में नगरीय समाज तीव्र गतिशीलता  रखता है । लेकिन नगरों में, जहां उपले सहज नहीं मिलते हैं, शोक  के समय इन्हें ढूंढ़ कर जुटाया जाता है । उसे घासलेट या पेट्रोल  डाल कर माचिस से जलाया जाता है और दरवाजे पर रखा जाता है । बिना यह सोचे कि आज इस उपक्रम का कारण और जरूरत क्या है !! 
                     आज की पीढ़ी में जिज्ञासा और चेतना अधिक है । अगर परंपराएं थोथी हैं या अप्रासंगिक हो गईं हैं तो बिना सोचे उसे ढ़ोते जाना हमारे अविवेकी  होने को प्रमाणित करता है । यदि हम नई पीढ़ी के सामने अपने को इसी तरह प्रस्तुत और प्रमाणित करेंगे तो उनसे सम्मान की आशा  करना उचित नहीं है । हमारी अगली पीढ़ी बिल्ली पकड़ने के लिए नहीं होना चाहिए । 

बुधवार, 4 जनवरी 2012

bk Dr. Shivani / ब्रहम्माकुमारी डॉ . शिवानी


                            धर्म और ईश्वर को लेकर मेरे मन में परंपरागत आस्था और विश्वास  नहीं है, यदृपि बचपन से ही घर में और आसपास लागों को पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन आदि करते देखता रहा हूं । अनेक ऐसी मान्यताओं पर मर मिटते लोग देखे हैं जिनका वैज्ञानिक आधार दूर दूर तक नदारत होता है । धार्मिक पाखण्ड इतना है कि सोच-विचार वाला कोई इसे देख कर अपने आप नास्तिकता के निकट जाने लगता है । शायद  इसीलिए धर्मक्षेत्र में प्रश्न  करने वालों या आशंका  रखने और व्यक्त करने वालों के लिए स्थान लगभग नहीं है । धर्म केवल विश्वास  करने वालों और बिना शर्त  आत्मसमर्पण कर देने वालों की दुनिया प्रतीत होती है । जनाधिक्य से पीड़ित आज के कठिन समय में संसार बहुत तेजी से बदल रहा है । प्रतिस्पर्धा, जोखिम और कामनाएं इतनी हैं  कि मानव जीवन असहज हो गया है । यह देख कर आश्चर्य  और दुःख होता है कि शिक्षा  और विज्ञान की समझ व उयोग बढ़ने के बावजूद नई पीढ़ी डरी हुई दिखाई देती है । इंजीनियरिंग और एमबीए तक पढ़े युवा हनुमान चालीसा  और दुर्गा सप्तषती का पाठ करते हैं तब वे अनपढ़ों से अधिक दयनीय और कमजोर दिखाई देते हैं । हाथ में डिग्री और मुँह में अंग्रेजी के कुछ कच्चे-पक्के वाक्य डाले भ्रमित ये समूह अंधविश्वासों और रूढ़ियों की जंजीरों से बंधे , सहमे अभी भी वहीं खड़े दिखाई देते हैं जहां इनके दादा-परदादा खड़े थे । माना जाता है कि शिक्षा  आधारहीन और अवैज्ञानिक विश्वासों  व मान्यताओं से मुक्ति का मार्ग दिखाती है । किन्तु ऐसा लगता है कि वैज्ञानिकता और ज्ञान रट कर प्राप्त होने वाली निधि नहीं है । यह स्थिति आज की शिक्षा  व्यवस्था पर एक प्रश्न  चिन्ह लगाती दीखती है ।
                बहरहाल, पिछले दो माह से टीवी पर एक कार्यक्रम ‘‘एवेकनिंग विथ ब्रहम्माकुमारीज’’ देखने का अवसर मिल रहा है । चैनल बदलते हुए अचानक मुझे इसका पता चला . धवल वस्त्रों में, सादगी से समृद्ध डॉ . शिवानी  के व्यक्तित्व ने कुछ देर रुकने के लिए प्रेरित किया । वे दैनिक जीवन में  व्यक्ति की आम किन्तु जटिल समस्याओं पर मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से चर्चा कर रहीं थीं । मानव मन को इस तरह समझने का मेरे जीवन में पहला अवसर था । यों जिज्ञासावश  मैं टीवी पर संतो-महात्माओं की बातें प्रायः सुनता रहा हूं । चैनलों पर बाइबिल और इस्लामी मत वाली चर्चाएं भी खूब सुनी हैं । लेकिन प्रायः अलौकिक शक्तियों  में विश्वास  करने , उनके मतों को निशंक  मान लेने और समर्पित हो जाने की मांग इनमें होती है । लेकिन डॉ . शिवानी  के संवाद में ऐसा कोई आग्रह या अपेक्षा नहीं होती है । वे एक दक्ष मनोवैज्ञानिक की तरह एक एक बात या गुत्थी को उठातीं हैं और अकाट्य तर्कों के साथ उसके समाधान बतातीं हैं । उनके यह उपाय इतने सरल और व्यवहारिक हैं कि सुनने वाला इसलिए चैंकता है कि वह शायद  जानता था लेकिन अब तक इसके प्रति सचेत नहीं था ।
अंग्रेजी समाचारों के चैनल ‘हेडलाइन टुडे’ पर प्रतिदिन प्रातः 6.30 पर आधे घंटे की यह चिंतन सभा , किसी सुलझे हुए प्रोफेसर के साथ बैठने और सीखने का अवसर है । ब्रहम्माकुमारी संस्थान की 120 देशों  में 8500 शाखाएं  कार्यरत हैं । इनका अन्तराष्ट्रीय मुख्यालय माउंट आबू में स्थित है । निसंदेह डॉ . शिवानी  के अलावा भी अनेक विदूषियां होंगी संस्थान के साथ , जिन्हें सुनने और समझने की लालसा है मन में ।

बुधवार, 23 नवम्बर 2011

* मैं पेड़ होना चाहता हूं .


               मुझे नहीं मालूम कि पेड़-पौधों का कोई परिवार होता है , जैसा कि हमारा होता है । यों देखा जाए तो शायद  होता होगा । बीज कैसे आते हैं ! अगर हम अपने जैसा हिसाब उन पर लगाएं तो लगता है पेड़ों के माता-पिता होते हैं, भाई-बहन होते हैं और पुत्र-पुत्री भी । पेड़ों की जाति होती है, उनका समाज भी होता होगा । जब इतना सब है तो उनमें संवाद होता होगा, उनकी कोई भाषा भी होगी, भावनाएं होंगी, उनके सपने भी होते होंगे, किसको पता ! लोग कहते हैं कि वे पेड़ों से बातें किया करते हैं । वे हमारे सुख-दुःख के साथी भी मानें जाते हैं । कई बार पेड़ों से नातेदारी होती है और निबाही भी जाती है । पेड़ों से शादियां करने की खबर आज भी सुनने में आती है । पेड़ कहीं पुरखों की भूमिका में होते हैं कहीं उनसे भी बड़े । उनकी पूजा की जाती है, आशीर्वाद  लिए जाते हैं, उनसे कुछ मांगा भी जाता है । मनुष्य के साथ पेड़ों का नाता जन्म के साथ झूले / पलने से आरंभ होता है और चिता तक बना रहता है । कबीर ने ‘देख तमाशा  लकड़ी का’ गा कर पेड़ों की महिमा का बखान किया ही है ।
                    मैं अपने सामने, आंगन में लगे एक पेड़ को बहुत देर से देख रहा हूं । मैंने ही लगाया था कहीं से ला कर , शायद खरीद कर । यह शुरू  से अकेला है , पता नहीं इसका कौन है ! न जाने इसके जन्मदाता कहां हैं, ... और बच्चे भी ! मौसम आते हैं और हर बार यह यांत्रिकता से हरियाता है , फूलता है, फलता है । फिर अकेला हो जाता है । मैं पूछना चाहता हूं इससे, कहां है तेरे पिता , कहां है पुत्र ? और एक निरर्थक कहानी सी धुंधियाने लगती है हवा में, जिसके आरंभिक और अंत के पृष्ठ कोई फाड़ ले गया है । उत्तर में वह पेड़ धरती और आकाश  को नाप देता है । हवा, प्रकाश  सबके नाम बता देता है। विश्वास -अविश्वास  के असंख्य पत्ते झरने लगते हैं । आज लिखते समय भी लग रहा है कि मैं अपने को बहला ही रहा हूं । बहलाने वाला ‘मैं’ और न बहलने वाला ‘मैं’, दो अलग इकाइयां खड़ी हो रही हैं । इन दोनों को महसूस करता एक तीसरा ‘मैं’ भी मौजूद है, लग रहा है खण्ड-खण्ड हो रहा हूं । हंसते, गाते, रोते, रीझते, खीझते मैं ही मैं हूं । ‘मैं’ की एक भीड़ होती जा रही है ... भीतर । अकेला पेड़ सामने हैं लेकिन एक जंगल पसर गया है अंतस में । अपने ही जंगल में भटकता, भ्रमित होता अक्सर बेचैन महसूस करता हूं । अकेले में अपने से ही डरता हूं और ऐसी जगह भाग जाना चाहता हूं जहां मेरा ‘मैं’ न हो । न मेरी धड़कनें, न सांसें, न स्मृतियां, न दुःख । जैसे सन्यासी त्याग कर चले जाते हैं संसार को कंदराओं में , न लौटने के निश्चय  के साथ। किसी सूनी घाटी में जैसे एक पेड़ खड़ा हो जीवित, निर्जीव सा ।
                  मैं पेड़ होना चाहता हूं , ताकि जब लौटूं इस संसार से स्मृतियां साथ न हों , न शिकायतें  किसी से, और न हिसाब लिए-दिए का । क्योंकि शायद  पेड़ों की स्मृतियों में कोई नहीं होता । वे बिना यादों के आते हैं और सब भूल कर जाते हैं ।

बुधवार, 19 अक्तूबर 2011

एक लापरवाह कौम की भाषा चेतना !


                             केन्द्र सरकार की चिंता यदि यह है कि राष्ट्र्भाषा हिन्दी को क्लिष्ट और लगभग अव्यवहारिक अनुवादों से बाहर निकाल कर सरल व सुबोध बनाया जाए, तो हाल ही में राजभाषा विभाग द्वारा प्रशासनिक  विभागों को जारी किए गए उसके परिपत्र का स्वागत किया जाना चाहिए । कोई भी भाषा जनस्वीकृति और लोकव्यवहार से विकसित और समृद्ध होती है । किसी जमाने में संस्कृतियां स्थानीय होती थीं । भारत में तो कहा ही जाता था कि ‘चार कोस में बदले पानी और आठ कोस में बानी’ । यातायात और संचार साधनों के विकास से संस्कृतिक आदान-प्रदान सुगम होता है, और शब्दों  का लेन-देन निर्बाध । जिन देशों  में विदेशी  ताकतों का शासन  रहा हो वहां सत्ता पक्ष का की भाषा के शब्द  तेजी से फैल कर स्थानीय भाषाओं में और लोकव्यवहार में अपनी जगह बना लेते हैं । यह स्वाभाविक प्रक्रिया है । यही कारण है कि हिन्दी में अरबी, फारसी, उर्दू और अंग्रेजी के शब्द स्वीकृत हैं । शासकीय  कामकाज के स्तर पर अनुवादक जिस हिन्दी का प्रयोग करते हैं वो प्रायः जटिल और हास्यास्पद हो जाती है । हिन्दी सरल इसलिए भी है कि इसमें भारत की अनेक भाषाओं, बोलियों के शब्द सम्मिलित हैं । इसलिए मराठी, पंजाबी, बंगला , उर्दू तमिल, तेलुगू आदि बोलने वालों को भी बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के हिन्दी में  अपनेपन के अंश  मिल जाते हैं । भाषा का यही गुण उसे समृद्ध और दीर्घजीवी बनाता है । 
                        कुछ शुद्धतावादी भाषा-चिंताकारों को लगता है कि अंग्रेजी के शब्द को शामिल  करने की सरकारी इजाजत से भाषा मर जाएगी या हिन्दी कुछ दिनों में हिंग्लिश हो जाएगी । वे मानते हैं कि किसी यह अन्तराष्ट्रीय षड़यंत्र के तहत हो रहा है । माना कि ऐसा हो रहा है तो क्या हम किसी समुदाय को उसके भाषा प्रचार या विकास से रोक लेंगे ? किसी भाषा के विस्तार में कई चीजें काम करती हैं, जिसमें भाषा का अपना आभामंडल बहुत प्रभावी होता है । सरकार ने कहीं आदेश नहीं निकाला है कि हम अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाएं । बल्कि विशेषज्ञों  की राय तो यही है कि प्रथमिक शिक्षा  मातृभाषा में दी जाना चाहिए । लेकिन हो क्या रहा है ? हिन्दी स्कूल सरकारी हैं और लगभग खाली पड़े हैं । निजी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम है और जगह नहीं है । हमारे अंग्रेजी आतंक के कारण गली गली में अंग्रेजी माध्यम की दुकानें चल रही हैं ! पिछले छः दशकों से लगातार अंग्रेजी के शब्द लोकव्यवहार में आ रहे हैं । यह एक कड़वा सच है कि देश अपनी अगली पीढ़ी इंग्लिश मीडियम स्कूलों में गढ़ रहा है । खुद भाषा के चिंताकारों में आत्मविश्वास  नहीं है कि इनमें से अधिकांश अपने बच्चे अंग्रेजी स्कूलों में पढ़वा रहे हैं । माना कि शिक्षा  और करियर की विवशता के चलते उन्हें ऐसा करना पड़ रहा है लेकिन दैनिक व्यवहार में अंग्रेजी के आग्रह की प्रवृत्ति किस मंशा  से पाले हुए हैं वे !? इंग्लिश मीडियम स्कूल के एक अध्यापक  ने बताया कि स्कूल परिसर में हिन्दी बोलने पर प्रतिबंध और दंड के प्रावधान से डर था कि पालक इसका विरोध करेंगे । किन्तु आश्चर्य  कि इसी वजह से उनका स्कूल प्राथमिकता में आ गया ! जब कोई कौम अपनी भाषा को लकर खुद सचेत नहीं है और उसमें पल रहे भाषा-चिंताकार भी नकली हों तो अन्य चीजों की भांति भाषा भी भगवान भरोसे ही रहेगी । भाषा के जरिए विशेष  हो जाने की मंशा  को अधिक दिनों तक छुपाना संभव नहीं दिखता है । 
                                     केवल स्कूलों की बात ही नहीं है, पत्र-पत्रिकाओं और किताबों की ओर देखें । 60 करोड़ हिन्दी जानने वालों के देष में हिन्दी की किताबों के संस्करण एक हजार प्रतियों से कम के हो रहे हैं । कहने को षिक्षा का प्रतिषत बढ़ा है लेकिन हिन्दी के पाठक कहां हैं ? मात्र दो प्रतिशत अंग्रेजी जानने वालों के बीच अंग्रेजी की किताबें लाखों की संख्या में बिक जाती हैं ! 
                               क्यों नहीं समस्या की जड़ की ओर ध्यान दिया जाता है । स्कूलों से संवाद हो और हिन्दी के प्रति उनके नजरिए को बदलने का प्रयास किया जाए । भले ही पढ़ाई का माध्यम अंग्रेजी हो लेकिन हिन्दी को असफलता से जोड़ कर देखने-दिखाने की प्रवृत्ति पर रोक लगे । स्कूल की तमाम दूसरी गतिविधियां हिन्दी में संचालित हों और बच्चों को अपनी राष्ट्र्भाषा के निकट आने में मदद की जाए । देश हर एक को अपनी बात कहने का अधिकार देता है लेकिन राष्ट्र्भाषा को अपमानित करने की इजाजत तो किसी को नहीं होना चाहिए । प्रथमिक स्तर की शिक्षा  के लिए पचास हजार से एक लाख रुपए तक की फीस वसूलने वाले स्कूलों को सरकारी अनुदान की जरूरत भले ही न हो पर उन्हें शासकीय  आदेश तो मानने ही होंगे । 

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सोमवार, 19 सितम्बर 2011

वही नहीं थे महफिल में , जिनसे चिराग रौशन रहे ...


                           हाल ही में एक अखबार ने इस बात के लिए जश्न  मनाया कि उसकी प्रसार संख्या में काफी इजाफा हुआ है । पाठक संख्या , जैसा कि उनका अनुमान है , दुगनी हो गई है । अखबार के अनेक संस्करण निकाले जा रहे हैं । पृष्ठों की संख्या भी पहले से अधिक है । बरसों पुराने , बूढ़े हो चुके पाठकों के अलावा नए और युवा पाठक भी बड़ी संख्या में जुड़ चुके हैं । ऐसे लेखक जिनकी पहचान राष्ट्रिय  स्तर पर है , अब इस अखबार के लिए लिख रहे हैं । यही नहीं अखबार का दावा है कि वह नए लेखकों और स्थानीय भाषा के विकास के मामले में उदार है । पाठकों को अच्छी और पठनीय सामग्री मिले इसके प्रति गंभीरता का उसका दावा हमेशा  नारे की तरह होता है ।
                 सफलता का यह जश्न  एक बड़े होटल में अयोजित था । दूसरे दिन बड़े बड़े फोटो तीन पेज में लगा कर पाठकों को इसकी जानकारी दी गई । अतिथियों में सारे लोग विज्ञापनदाता थे । यही नहीं हरएक फोटो के नीचे लिखा हुआ था कि ये साहब फलां कंपनी के हमारे विज्ञापनदाता हैं । कई विज्ञापन एजेन्सियों के विकास पुरुष महामहिम की सी मुद्रा में दिखाए गए थे । अखबार का सारा कुछ विज्ञापन के आसपास का था और उनके बीच अखबार के प्रतिनिधि पुलकित और बिछे जा रहे दिख पड़ रहे थे ।
                   सवाल यह है कि जब एक अखबार अपनी सफलता का जश्न मनाता है तो पाठकों को क्या यह सन्देश  देना भी जरूरी है कि उनके लिए केवल विज्ञापनदाता ही सबकुछ हैं ! अखबार में विज्ञापन ही होते हैं क्या ! क्या वे जानते हैं कि ज्यादातर लोग पूरे पृष्ठ पर छपे विज्ञापन को देख कर कुपित होते हैं और प्रायः बिना पढ़े उसे पलट देते हैं । जैसे कि टीवी पर विज्ञापन आते ही नब्बे प्रतिशत  लोग म्यूट कर देते हैं । माना कि अखबार चलाने वालों के लिए विज्ञापनदाता मांईं-बाप होते हैं लेकिन अन्य महत्वपूर्ण घटकों की उपेक्षा करना क्या सन्देश  देता है । अखबार के वे लेखक क्यों नहीं थे जश्न में जिन्हें पढ़ने के लिए पाठक अखबार खरीदता है । वे संपादक, पत्रकार और कालमिस्ट भी नजर में नहीं आए जिनसे अखबार इतना लोकप्रिय हो सका ! प्रायः हर अखबार में लिखने वाले स्थायी होते हैं भले ही वे उसमें नौकरी नहीं करते हों । वे पाठकों की पसंद होते हैं और अखबार की प्रतिष्ठा भी बढ़ाते हैं । लेकिन जब जश्न मनाना हो , सफलता प्रदर्षित करना हो तो इन्हें अनदेखा करने की प्रवृत्ति आम है । पाठकों से मालिक क्या अपनी यह कृपणता अधिक दिनों तक छुपा पाएंगे ?

सोमवार, 29 अगस्त 2011

अन्ना के कुम्भ में पवित्र गंगा स्नान !


                          भारतीय राजनीति और प्रशासन  में भ्रष्टाचार की लत को लेकर अन्ना हजारे एवं उनकी टीम अविश्वसनीय  आंदोलन किया और अद्भुत सफलता प्राप्त की इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिए, हालांकि पीड़ित पक्ष को अब मौका मिलेगा और वे बयानबाजी करने और मीनमेख निकालने में कोई कसर नहीं रखेंगे । अन्ना के चारित्रिक हनन का प्रयास राजनीतिक स्तर पर फूहड़ता से हो चुका है किन्तु सफलता नहीं मिली । जनता जानती है कि हमारे राजनीतिज्ञ आसानी से घुटने टेक देने वाले नहीं हैं । यह पहली बार नहीं हो रहा है कि लोगों ने अपनी नाराजी व्यक्त की है । अभिनेता ओमपुरी ने जो भी कहा वह विवादित हो सकता है, उन्होंने माफ़ी भी मांग ली है , लेकिन यह भी सच है कि जनता उनके साथ इत्तफाक रखती है । समर्थन के बावजूद अन्ना टीम ने जब तवज्जोह नहीं दी तो मायावती ने भी अपना गुस्सा निकला और अन्ना को 2016 में होने वाले आम चुनाव में चुनाव लड़ने, बहुमत प्राप्त करने और अपना लोकपाल बिल पास कर लेने की चुनौती दी । संसद में कई नेताओं ने, जितनी संभव हो सकती थी अन्ना की खिल्ली उड़ाई और नेताओं को दूध का घुला साबित करने का प्रयास किया ! हाल ही में अन्ना-टीम के सदस्य अग्निवेश  का वीडियो जारी हुआ है जिसमें वे आंदोलन में सेंध मारते दिखाए गए हैं ! जब टीम में ही जयचंद हों तो लड़ाई और कठिन हो जाती है, शायद  हुई भी हो । इस तरह के "अंधकारवेशी"  लोग अब सक्रिय होंगे । अन्ना के उपवास टूटने से जनसैलाब का जो दबाव सामने था वह कुछ दिनों में ठंडा पड़ जाएगा । लोकपाल बिल से जिनके हित प्रभावित हो रहे हैं वे शीघ्र  ही लामबंद होंगे । उन्हें सत्ता का साथ भी मिलेगा और वे अपने पक्ष में हर तरह की चालाकी करने का प्रयास करेंगे क्योंकि यह उनके अस्तित्व का सवाल बन गया है ।
                 
                      इस आंदोलन में मीडिया का असामान्य सहयोग मिला है, जो चैंकाने वाला है । इस पर भी एक अध्ययन की आवश्यकता  है । मीडिया, खासकर इलेक्ट्रानिक  मीडिया में भ्रष्टाचार के आरोप और अनुमान लगाए जाते रहे हैं । राड़िया प्रकरण की चर्चा से देश  हाल ही में चौंका  था । हिन्दी पत्रिकाएं , जैसे हंस , कथादेश  आदि ने मीडिया विशेषांक  निकाले हैं और अंदर की बहुत सी तस्वीरों से देश  को परिचित कराया । सबको पता है कि टीआरपी के चक्कर में देश के सामने सही-गलत सब परोसा जाता है । यह हमारे देश में ही हो सकता है कि अत्याधुनिक टेक्नोलोजी  उपयोग अंधविश्वास को पुनर्जीवित करने और फैलाने में भी किया जाता है । पेड-न्यूज जैसे धंधे के बारे में इतनी बात हो चुकी है कि अब आम आदमी भी इसका सच जानने लगा है । अन्ना के आंदोलन में टीवी मीडिया के सहयोग से फिलवक्त ख़ुशी  है लेकिन इसके मायनों की तह में जाने की जरूरत है ।
क्या टीवी मीडिया ने इस आंदोलन में अपनी कम हो रही ताकत पुनः प्राप्त करने में सफलता पाई । जानबूझ कर सरकार की जिस तरह से उपेक्षा की गई वह पत्रकारिता की दृष्टि से कितनी उचित है यह अलग विषय है किन्तु सरकार को, बिना जोखिम उठाए, आंख दिखाने का काम जोरदार ढंग से हो गया । टीवी ने अन्ना का माहौल एक तरफा कर दिया, देश को केवल एक पक्ष दिखा कर भ्रष्टाचार को नेताओं और सरकार पर ही केन्द्रित कर दिया । निसंदेह इससे आंदोलन मजबूत हुआ और सरकार उसके आगे लाचार भी हुई । लेकिन आगे क्या ?! क्या सरकारें टीवी मीडिया से अब पहले से ज्यादा खौफ खाएंगी ? क्या एक पावर-गेम हो गया और देश को पता नहीं चल पाया ? जल्द ही इसका पता भी चलेगा । हो सकता है कि आने वाले समय में सरकारें मीडिया के इशारों  पर बनें या गिरें भी । क्या सत्ता के क्षेत्र में निर्णायक जगह बनाने की लंबी योजना का पहला कदम उठा लिया गया है !? या फिर नागाओं ने अन्ना के कुंभ में पवित्र गंगा स्नान कर अपने पाप धो लिए हैं और अब नए सिरे से सक्रिय होने वाले हैं ? 64 वर्षों में जनता मजबूरन शंका  करना सिख गई है । ईश्वर से प्रार्थना है कि ऐसा न हो ।

शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

Anna / अन्ना होने के कई मतलब .


                    अन्ना को मिले प्रबल समर्थन ने हमें अपनी मान्यताओं पर पुनः विचार करने के लिए विवश  कर दिया है । विशेषकर भारतीय समाज अपनी मान्यताओं को लेकर बहुत रूढ़ है । प्रायः अवैज्ञानिक धारणाएं सामाजिक जीवन में अनेक प्रकार के अवरोध की तरह मौजूद होती है और सामान्य आदमी बाधादौड़ की तरह अपना जीवन जीता है । कई बार तो हमारी मान्यताएं ही हमारे संबंधों और जीवन के लिए खतरा हो जाती हैं । स्त्री के डायन होने, किसी के अपशगुनी होने, नजर लगने, कहीं नहा लेने पर पवित्र होने, किसी तांत्रिक की उलजुलूल हरकतों पर भरोसा कर अपने बच्चों को खतरे में खुद ही डाल देना, दैवीय ताकतों को प्रसन्न करने के लिए बलि देना आदि अनेक उदाहरण हैं जो भारतीय जनजीवन में आज भी देखे जा सकते हैं । हालांकि इस बात से हर कोई इत्तफाक नहीं रखता है किन्तु इनकी संख्या बहुत कम है । शिक्षा का प्रचार प्रसार खूब हुआ है । कहने को विज्ञान की पढ़ाई ही हो रही है इन दिनों । बच्चों को आधुनिक शिक्षा मिल रही है और वे विज्ञान की दिशा में ही आगे बढ़ रहे हैं । फिर भी परीक्षा के दिनों में मंदिरों में विद्यार्थियों की भीड़ में अप्रत्याशित  वृद्धि हर किसी को न केवल चौंकती है वरन कुछ सोचने पर भी मजबूर करती है । 

                 लेकिन इनसे अलग कुछ और मान्यताएं हैं जो जिन्हें आप वैज्ञानक भी कह सकते हैं । मसलन आदमी अगर शिक्षित नहीं है या कम पढ़ा है तो वह अज्ञानी ही होगा । उसे आज के जमाने की , खासकर समाज व्यवस्था को जानने-समझने की योग्यता नहीं होगी । ऐसे व्यक्ति को जिम्मेदारी के काम नहीं सौंपे जा सकते हैं । नौकरी में भी उसे प्रायः शारीरिक  श्रम के लिए ही योग्य माना जाता है , वो भी तब जब वह स्वस्थ हो । अन्ना खुद सेना में ड्रायवर के पद पर कार्य करते थे । दूसरा यह कि जो आदमी गरीब है, जिसके पास अपना घर तक नहीं है, रहने-खाने का कोई उचित बंदोबस्त नहीं है और यदि वह साधु-संत नहीं है तो समाज में उसे सम्मान नहीं मिलेगा । उसके साथ भिखारी के समान व्यवहार किया जाएगा । उसे सब खरीखोटी सुनाएंगे, उसकी सुनने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता है क्योंकि वह इतना असफल है कि खुद के लिए भी कुछ नहीं कर पाया है । तीसरी बात यह कि समाज में आज बूढ़ों का सम्मान नहीं है । उनके अपने बच्चे उनकी नहीं सुनते हैं और वे परिवार में बोझ समझे जा रहे हैं । वृद्धाश्रमों में पटके जाने वालों की संख्या पिछले दो दशकों में खूब बढ़ी है । दिल्ली में तो खाते-पीते घर के बुजुर्ग वृद्धाश्रमों में रहने के लिए विवश  है और किसी भी कीमत में यह मानने को तैयार नहीं हो सकते हैं कि आज के युवा किसी बूढ़े को आदर दे सकते हैं । यही नहीं गांव के लोगों को तो गंवार कहना या मानना शहरी  सभ्यता का विशेषाधिकार  है । मूर्ख व्यक्ति को गंवार कहना आम है, ‘गंवार कहीं का’ एक गाली ही हो गई है जिसे धडल्ले से इसी भाव के साथ प्रयोग किया जाता है ।
                      अन्ना के जनलोकपाल बिल संबंधी आंदोलन का क्या होगा यह तो समय बताएगा किन्तु प्रसन्नता की बात यह है कि अन्ना ने अनेक जनमान्यताओं को बदल कर रख दिया है । वे आज के तथाकथित दिशाहीन कहे  जाने वाले युवाओं के बीच ऐसे वृद्ध हैं जिनका अभूतपूर्व आदर होते हुए हम देख रहे हैं । ये वही युवा है जिन पर हमारी तोहमतें किश्तों  में जारी रहती हैं । वे जानते हैं कि अन्ना मात्र सातवीं कक्षा तक पढ़े हैं और गांव के रहने वाले हैं । उनके पास प्रभाव जमाने के लिए अंग्रेजी भाषा, टाई-कोट युक्त परिधान या धन नहीं है । फिर क्या है उनके पास !?
                    आज भारत देख रहा है कि जिस व्यक्ति के पास चरित्र होता है , जिसके पास ईमानदारी है, जो सच्चा है, नेक है , जिसके मन में कपट नहीं है, जो जानता है कि बुराई क्या और कहां है, जिसमें बुराई पर अंगुली रखने का साहस है और जो लोककल्याण के लिए सोचता है और दूसरों के लिए जीता है उसे इंसान तो क्या पत्थर भी आदर देने के लिए विवश हो जाते हैं ।

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बृहस्पतिवार, 18 अगस्त 2011

ANNA-एक आन्दोलन- अपने खिलाफ भी !


           यहाँ यह साफ समझ लेना जरुरी है कि अन्ना हजारे जो कम कर रहे हैं वह गाँधी जी के काम  से किसी तरह भी कम नहीं है , आपितु ज्यादा ही है .  बरसों से भ्रष्टाचार  की मार झेलते  लोग इतने दुःखी और परेशान हो गए हैं कि इससे मुक्ति का  उपाय सामने पाते ही उनका आक्रोश  संगठन में तब्दील हो गया यह भ्रष्टाचार ही है जिसके कारण केवल हम अपने लोकतंत्र को कोसने लगते हैं अपितु बार बार यह कहते-सुनते हैं कि इससे तो अंग्रेजों का जमाना अच्छा था गोरे तो पराए थे, उनके जुल्म स्वाभाविक थे, लेकिन काले !! लगता ही नहीं कि ये अपने हैं ! और जनता के भरोसे के साथ हैं, उनके चुने प्रतिनिधि हैं ! 64 साल के लोकतंत्र ने जनसेवकों को सेवा का पाठ कितना पढ़ाया कहा नहीं जा सकता लेकिन खाने-पचाने की बेशर्मी  में वे पारंगत नजर आते हैं राजनीति गंगा होनी थी किन्तु महानुभावों ने इसे गंदा नाला बना  दिया यही वजह है कि जब बाबा रामदेव ने हल्ला बोला तो पूरे देश  में हलचल हुई और उनके साथ बड़ा जनसमूह हो लिया सरकार ने बाबा को कुचल कर अपने लिए ऐतिहासिक अलोकप्रियता/ बदनामी  बहुत कम समय में अर्जित कर ली जिसका परिणाम यह हुआ है कि अन्ना के हर कदम का असर उसकी वास्तविक धमक से कहीं अधिक प्रभावी बन गई    संसद में सरकार ने वजनदार तर्क दिए लेकिन बाहर वे इस तरह सुने गए जैसे एक अपराधी अपने बचाव में बकवास करता है  
                     किन्तु सब अच्छा ही हो रहा है ऐसा नहीं है, बहुत से भ्रम भी हैं जो इस आंदोलन के भविष्य के लिए ठीक नहीं कहे जा सकते हैं ज्यादातर लोग मान रहे हैं कि भ्रष्टाचार नेताओं और अधिकारियों द्वारा पैसा खाने और घोटाला करने भर का मामला है दूसरे शब्दों  में कहें तो ऐसा लग रहा है कि यह सरकार और अन्ना समर्थकों के बीच का विषय है और साफ कहें तो  मात्र कांग्रेस निशाने पर है, क्योंकि आजाद भारत में ज्यादा समय उसका ही शासन  रहा है और घोटालों में उसके ही मंत्रियों ने अभूतपूर्व प्रतिभा का प्रदर्शन किया है हाल ही में कुछ नेताओं ने अन्ना पर कीचड़ उछाला और अपनी पार्टी की मुसीबतें बढ़ा दी दूसरे दल या तो स्थिति को मूक दर्शक बने थ्री-डी मूवी की तरह देख रहे हैं या फिर गिद्ध दृष्टि लगाए बैठे हैं, कब भैंस मरे और  टूट पड़ें अन्ना के साथ किसी तरह खड़े हो जाने का मौका पा जाना आज अपने को ईमानदार बताने के लिए, बल्कि यों कहना चाहिए कि साबित करने के लिए,  पर्याप्त लग रहा है हाल ही में .प्र. की मुख्यमंत्री मायावती ने अन्ना के आंदोलन का समर्थन कर देश और ईमानदारी दोनों का मजाक उड़ाया कल को लालू, शिबू सोरेन और जयललिता भी साथ खड़े हो सकते हैं  कोई आश्चर्य नहीं कि कलमाड़ी  भी अन्ना के समर्थन  में  भूखे  बैठ  जाएँ . नेता ही क्यों, काले धन को सफेद करने वाले संत-प्रवचनकार और आर्थिक जगत के तमाम मगरमच्छ पीछे रहेंगे क्या ! अन्ना के कुम्भ में स्नान करना नंगे पापियों को असान युक्ति के रूप में दिख रहा है मात्र टीका लगाने भर से कोई पवित्र मान लिया जा रहा हो तो किसके माथे पर जगह नहीं है अगर तिलक से ही वर्ण तय हो सकता तो एक प्रहर में ही देश  ब्राहम्णों से भर जाता और मामलों में कर्म का महत्व भले ही हो लेकिन ईमानदारी का आधार यही होगा भ्रष्टाचार के विरोध और अन्ना के समर्थन के लिए दनादन एसएमएस चल रहे हैं इनमें वे भी शामिल   हो गए हैं जो भ्रष्टाचार पर ही जीवित हैं और तो और वे जुलूस, रैलियों और प्रदर्शनों   का हिस्सा भी बन रहे हैं ! हाथों में अन्ना के चेहरे वाले पोस्टर हैं लेकिन उनके लोटों में दूध नहीं पानी है हो सकता है कि कल अन्ना देखें कि वे षड़यंत्र का शिकार   हो गए हैं  
                               किसी भी धंधे वाले से भी बात कर लीजिए वो कहेगा कि आजदो नंबरमें काम किए बगैर कोई बिजनेस मुमकिन नहीं है बिना बिल के हर बाजार में खूब काम होता है, ग्राहक की जेब से टेक्स की रकम निकलती है लेकिन सरकार को नहीं मिलती है जो लोग नकली घी-खोया-पनीर या तेल आदि खाद्य पदार्थो में मिलावट का धंधा पुश्तैनी रूप से करते रहे हैं उन्हें लगता है कि पकड़े जाने पर भारी रकम लेने वाला अधिकारी भ्रष्ट है वे  नहीं  , उन्हें उससे मुक्ति मिलना चाहिए सोने के जेवर बनवाते समय बाजार कीधाराके नाम पर हम कैसे और कितने ठगे जाते हैं,  कितनों को पता है ? कौन सा ऐसा पेशा है जिसमें आचरण भ्रष्ट नहीं हो रहा है ? क्या आंदोलन के लिए हम उस तरह से तैयार हो चुके हैं जैसे गांधी जी ने विदेशी कपड़ों की होली जलवा कर और अंग्रेजों की नौकरी के त्याग से तैयार किया था  
                        लेकिन  इसका  मतलब  यह  भी  नहीं है  की  अन्ना  का  आन्दोलन  बेमायनी  है .

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