Friday, March 18, 2011

HOLI HAI !!! /....... बुरा न मानो होली है !!!

फैशन का टेंशन
जवाहर चौधरी
आज का फैशन सफलता की ऊंचाइयों को स्पर्श करते हुए कमर की नीचाइयों पर चमत्कारिक रूप से टिका हुआ है। कट-रीनाओं से लेकर मल्लिकाओं तक की कमर के अंतिम छोर पर एक रेखा होती है, जिसे सिनेमाई शहर में ‘एलओसी’ कहा जाता है। जैसे गरीबी की रेखा होती है, लेकिन दिखाई नहीं देती, वैसे ही फैशन की भी रेखा होती है, जो कितनी भी आंखें फाड़ लो, दिखाई नहीं देती है। एलओसी एक आभासी रेखा होती है, सुधीजन जिसकी कल्पना करते पाए जाते हैं। मैडम दुशाला दास का टेंशन इसी एलओसी से शुरू होता है।

दुशाला जी को चिंता तो तभी होने लगी थी, जब सुंदरियां मात्र डेढ़ मीटर कपड़े का ब्लाउज पहनने लगीं थीं। लेकिन अब डेढ़ मीटर कपड़े में दस ब्लाउज बन रहे हैं, तो वे टीवी खोलते ही तमतमाने लगती हैं। उस पर दास बाबू का दीदे फाड़ कर टीवी देखना उनकी बर्दाश्त के बाहर हो जाता है। मुए मर्द हय-हय, अश-अश करते बस बेहोश ही नहीं हो रहे हैं। जी चाहता है कि बेवफाओं को दीवार में जिंदा चुनवा कर अनारकली की वफा का हिसाब बराबर कर लें नामुरादों से। पिछले दिनों कट-रीनाओं ने असंभव होने के बावजूद जब एलओसी को नीचे की ओर जरा और खिसका दिया तो मैडम दुशाला को मेडिकल चेकअप के लिए ले जाना पड़ा।

              डाक्टर ने आदतन सवाल किया कि ‘आपको किस बात का टेंशन है?’ जवाब में उनके टेंशन का लावा बह निकला, बोलीं - ‘ हवा-पानी के असर से कभी-कभी पहाड़ भी भरभरा कर गिर जाते हैं। किसी दिन लगातार जीरो साइज होती जा रही कमर घोखा दे गई तो... टीवी वाले हफ्तों तक, बल्कि तब तक दिखाते रहेंगे तब तक कि देश  की पूरी एक सौ पंद्रह करोड़ जनसंख्या की दो सौ तीस करोड़ आंखें तृप्त नहीं हो जातीं ।  हमारी सरकार किसी ‘एलओसी’ की रक्षा नहीं कर पा रही है! क्या होगा देश का?’ 
               15 दिन के बेड रेस्ट और टीवी न देखने की हिदायत के साथ वे लौटीं। अभी हफ्ता भी नहीं गुजरा था कि एक दिन दास बाबू रात दो बजे फैशन-टीवी का पारायण करते हुए रंगी आखों बरामद हुए।यहाँ ‘एलओसी’ की समस्या नहीं थी , वह मात्र एक रक्षा-चौकी  में बदल गई थी ।  खुद दास बाबू इतने विभारे थे कि जान ही नहीं पाए कि मैडम दुशाला  ने दबिश  डाल कर उन्हें गिरी हुई अवस्था में जब्त कर लिया है । सुबह तक दुशालाजी की पाठशाला चली, किंतु वे इस प्रश्न का उत्तर नहीं पा सकीं कि दास बाबू आखिर उसमें देख क्या रहे थे!
               दरअसल दास बाबू को टीवी में जो दिख रहा था, उससे ज्यादा उत्सुक होकर वे ‘संभावना’ देख रहे थे। चैनल भी बार-बार ब्रेक से  टीआरपी को कैश कर रहा था और ‘कमिंग-अप’ की पट्टी लगा कर संभावनाएं बनाए हुए था। हर ब्रेक के बाद ‘संभावना’ बढ़ रही थी और दास बाबू को दास बनाती जा रही थी। वे सारांश पर आए कि संभावना से आदमी को ऊर्जा मिलती है।

                 दुशालाजी दुःखी इस बात से हैं कि टीवी वाले पत्रकार इतना खोद-खोद कर पूछते हैं कि जवाब देने वाला लगातार गड्ढ़े में धंसता चला जाता है, लेकिन इन देवियों से नहीं पूछते कि कमर को पासपोर्ट की तरह इस्तेमाल करना आखिर कब बंद करेंगी? संयोगवश एक दिन उनकी यह तमन्ना पूरी हो गई। टीवी के ‘बहस और चिंता’ कार्यक्रम में वे सवाल पूछ रहीं थीं कि आपको डर नहीं लगता, अगर कहीं सारा फैशन भरभरा कर गिर पड़े तो...। उपस्थित कट-रीनाओं में से एक ने जवाब दिया, ‘काश ऐसा होता ! ..... गिरने की संभावना फैशन का सबसे बड़ा कारण है, ...... लेकिन अब तक गिरा तो नहीं ..।’

                 ‘लेकिन टेंशन तो बना रहता है .  ऐसा फैशन आखिर किस लिए?’ वे बोलीं।‘ जिसे आप डर कह रही है, दरअसल वो अमूल्य संभावना है। फैशन का काम ही संभावना पैदा करना है।‘ दुशाला-दास’ होने में आज की दुनिया कोई संभावना नहीं देखती है। और जिसमें ‘संभावना’ नहीं होती वो भगवान के भरोसे होता है।’ दुशालाजी को जैसे डाक्टर से जवाब मिल गया। एक नए टेंशन के साथ वे लौट रही हैं।

2 comments:

  1. होली के अवसर पर शानदार और जानदार व्यंग के लिये बधाई । होली की सादर शुभकामनाएं ।

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  2. होली का त्यौहार आपके सुखद जीवन और सुखी परिवार में और भी रंग विरंगी खुशयां बिखेरे यही कामना

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