Wednesday, November 23, 2011

* मैं पेड़ होना चाहता हूं .


               मुझे नहीं मालूम कि पेड़-पौधों का कोई परिवार होता है , जैसा कि हमारा होता है । यों देखा जाए तो शायद  होता होगा । बीज कैसे आते हैं ! अगर हम अपने जैसा हिसाब उन पर लगाएं तो लगता है पेड़ों के माता-पिता होते हैं, भाई-बहन होते हैं और पुत्र-पुत्री भी । पेड़ों की जाति होती है, उनका समाज भी होता होगा । जब इतना सब है तो उनमें संवाद होता होगा, उनकी कोई भाषा भी होगी, भावनाएं होंगी, उनके सपने भी होते होंगे, किसको पता ! लोग कहते हैं कि वे पेड़ों से बातें किया करते हैं । वे हमारे सुख-दुःख के साथी भी मानें जाते हैं । कई बार पेड़ों से नातेदारी होती है और निबाही भी जाती है । पेड़ों से शादियां करने की खबर आज भी सुनने में आती है । पेड़ कहीं पुरखों की भूमिका में होते हैं कहीं उनसे भी बड़े । उनकी पूजा की जाती है, आशीर्वाद  लिए जाते हैं, उनसे कुछ मांगा भी जाता है । मनुष्य के साथ पेड़ों का नाता जन्म के साथ झूले / पलने से आरंभ होता है और चिता तक बना रहता है । कबीर ने ‘देख तमाशा  लकड़ी का’ गा कर पेड़ों की महिमा का बखान किया ही है ।
                    मैं अपने सामने, आंगन में लगे एक पेड़ को बहुत देर से देख रहा हूं । मैंने ही लगाया था कहीं से ला कर , शायद खरीद कर । यह शुरू  से अकेला है , पता नहीं इसका कौन है ! न जाने इसके जन्मदाता कहां हैं, ... और बच्चे भी ! मौसम आते हैं और हर बार यह यांत्रिकता से हरियाता है , फूलता है, फलता है । फिर अकेला हो जाता है । मैं पूछना चाहता हूं इससे, कहां है तेरे पिता , कहां है पुत्र ? और एक निरर्थक कहानी सी धुंधियाने लगती है हवा में, जिसके आरंभिक और अंत के पृष्ठ कोई फाड़ ले गया है । उत्तर में वह पेड़ धरती और आकाश  को नाप देता है । हवा, प्रकाश  सबके नाम बता देता है। विश्वास -अविश्वास  के असंख्य पत्ते झरने लगते हैं । आज लिखते समय भी लग रहा है कि मैं अपने को बहला ही रहा हूं । बहलाने वाला ‘मैं’ और न बहलने वाला ‘मैं’, दो अलग इकाइयां खड़ी हो रही हैं । इन दोनों को महसूस करता एक तीसरा ‘मैं’ भी मौजूद है, लग रहा है खण्ड-खण्ड हो रहा हूं । हंसते, गाते, रोते, रीझते, खीझते मैं ही मैं हूं । ‘मैं’ की एक भीड़ होती जा रही है ... भीतर । अकेला पेड़ सामने हैं लेकिन एक जंगल पसर गया है अंतस में । अपने ही जंगल में भटकता, भ्रमित होता अक्सर बेचैन महसूस करता हूं । अकेले में अपने से ही डरता हूं और ऐसी जगह भाग जाना चाहता हूं जहां मेरा ‘मैं’ न हो । न मेरी धड़कनें, न सांसें, न स्मृतियां, न दुःख । जैसे सन्यासी त्याग कर चले जाते हैं संसार को कंदराओं में , न लौटने के निश्चय  के साथ। किसी सूनी घाटी में जैसे एक पेड़ खड़ा हो जीवित, निर्जीव सा ।
                  मैं पेड़ होना चाहता हूं , ताकि जब लौटूं इस संसार से स्मृतियां साथ न हों , न शिकायतें  किसी से, और न हिसाब लिए-दिए का । क्योंकि शायद  पेड़ों की स्मृतियों में कोई नहीं होता । वे बिना यादों के आते हैं और सब भूल कर जाते हैं ।

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