Sunday, June 24, 2012

संभावनाओं के हरे पत्तों के लिए




                   तमाम लोगों की तरह खुद मुझे भी लगता रहा है कि हम जिस समय में रह रहे हैं उसमें लोग आत्मकेन्द्रित और बहुत हद तक स्वार्थ केन्द्रित हैं । शहर में पडौसी एक ‘बैड कंडक्टर’ की तरह साथ में बना रहता है । किसी को किसी से मतलब ही नहीं ! एक बिल्डिंग में अगर नीचे के फ्लोर पर किसी की मौत हो जाए तो उपर वाले की दुनिया अक्सर बेअसर रहती है । कितने बूढ़े हैं जो वृद्धाश्रम में इसलिए पड़े हैं कि अपने उन्हें देखना तक पसंद नहीं करते हैं । सड़क हादसों में लोग घायल पड़े रहते हैं और तमाशबीनों में कोई अस्पताल ले जाने वाला नहीं मिलता । गुण्डे घर के बाहर दबंगई करें और मदद के लिए पुकारे जाने पर भी कोई बाहर नहीं निकलता !! कर्ज में डूबा भाई सपरिवार आत्महत्या कर लेता है, सिर्फ इसलिए कि उसके सामने कहीं कोई संभावना शेष नहीं रह गई है । कितने ही बच्चे हैं जिन्हें मां-बाप के जाने के बाद सरपरस्ती नसीब नहीं हुई है । आज हर घर में एक या दो बच्चे होते हैं , जो नसीब के और मनौतियों के होते हैं । जिन पर आगे कुछ बन कर दिखाने की जिम्मेदारी है । मैं सोचता हूं कि वक्त जरूरत अगर किसी को पुकारूंगा तो शायद ही कोई आए । दिल्ली में तीन पढ़ी-लिखी अकेली लड़कियां अपने घर में असहाय अवस्था में पिछले दिनों भूखी मर गईं किन्तु जीतेजी उन्हें किसी से कोई सहायता नहीं मिली । कितने लोग इस समय असाध्य बीमारियों से पीड़ित हैं लेकिन जानते हैं कि कहीं कोई संभावना नहीं है । हम लोगों ने ज्यादातर मामलों में अपने को नियति के हवाले कर दिया है । इस वक्त भाग्य के भरोसे जितने लोग हैं, उतने पहले कभी नहीं रहे होंगे । कर्म संभावना पर काम कारता है । जहां संभावना नहीं वहां शून्य  होता है ।
                              लेकिन कभी कभी ऐसा कुछ घटता है कि समाज आत्मविश्वास  और संभावनाओं के नए विश्वास  से भर उठता है । बहुत पहले प्रिंस नाम का एक बच्चा बोरवेल में गिर गया था और बड़े प्रयासों से उसे बचा लिया गया था । इसके बाद ऐसी अनेक घटनाएं प्रकाश  में आईं और बच्चों को बचाया गया । हाल ही में माही नाम की लड़की बोरवेल में गिरी और 84 घंटों के अथक परिश्रम के बाद उसे निकाला जा सका । अफसोस की उसकी जान फिर भी नहीं बच सकी ।  उससे बड़ा दुःख इस बात का है कि माही के संबंधी प्रशासन पर लापरवाही का आरोप लगा रहे है। यह असहिष्णुता है । बचाव में लगे सारे लोग सद्भाव और स्वप्रेरणा से लगे रहे अतः उनका आभार माना जाना चाहिए । सबसे बड़ी बात यह है कि इनके प्रयासों से समाज एक महत्वपूर्ण 'संभावना' की रक्षा करने में सफल रहा । जिस  समाज में सड़क पर पड़े घायल को अस्पताल ले जाने वालों का टोटा हो वहां बोरवेल में 84 घंटे संघर्ष करने का समाचार आशा  पैदा करता है । जिस समाज और व्यवस्था को हर कोई नकारात्मक दृष्टि से देखता है वहां ऐसी घटनाएं और प्रयास एक बहुत जरूरी संभावना को पुनः स्थापित करते हैं । यह  हमारे सामाजिक  जीवन के लिए एक बहुमूल्य आश्वासन  है कि आप जिस समाज में रह रहे हैं वहां एक छोटी जान की कीमत भी समझी जा रही है ।  माही एक आम आदमी की बच्ची है, उसे बचाने में जुटे लोगों का काम मानवीय और नैतिक है । इन जैसे  प्रयासों  से निराशा  की तपन से सूखते पेड़ों में नए, हरे पत्ते निकलेंगे ।

1 comment:

  1. जवाहर जी आपने मेरे दिल की बात की है। आपका धन्‍यवाद। आशा है आप सानंद और सुखी रहेंगे।
    विकेश कुमार बडोला
    मेरा ब्‍लॉग लिंक - http://chandkhem.blogspot.in

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