Tuesday, August 20, 2013

कैसी रक्षा .... कैसा बंधन

त्योहार अब तमाम आर्थिक-राजनीतिक अवसर बन कर सामने आते हैं। पैसे और टोपियों की परिक्रमा कर रहा हमारा समाज त्योहारों के सांस्कृतिक सरोकारों से दूर होता जा रहा  है। त्योहार के मौके पर छलक आए जन-उल्लास को बाज़ार अपनी सेल में समेट लेने के लिए गलाकाट प्रयास करता है। अब तो लोग भी त्योहारों के सांस्कृतिक-पारंपरिक स्वरूप को भूलते जा रहे हैं और बाजार द्वारा चढ़ाए रंग में अपने को रंगने लगे हैं। नई पीढ़ी खरीदारी से ही त्योहार मानाती दिखाई देती हैं। सात दिनों तक देश रक्षाबंधन का त्योहार मना रहा है, बहनें अपने भाइयों की कलाई पर प्रेम का रक्षा-सूत्र बांध कर भाई के लिए सक्षम व समर्थ बनने की मंगलकामना कर रही हैं। आतताईयों वाला एक दौर ऐसा भी गुजरा है जब समाज में सामान्य रूप से स्त्रियां सुरक्षित नहीं थीं, हालाँकि आज भी स्थितियां बहुत बेहतर नहीं है। वो सुरक्षा कारण ही थे कि मां-बाप अपनी बेटी को संयुक्त परिवार में ब्याहना चाहते थे जहां दामाद के साथ उसके कई भाई भी हों। इकलौते पुत्र वाले छोटे परिवार प्रायः उपेक्षित रहते रहे हैं। आज लोकतंत्र है और सुरक्षा का भार सरकार तथा पुलिस जैसी सरकारी एजेन्सियों के पास है। कहा जा सकता है कि कुछ हद तक कानून ने भाई की जिम्मेदारी ले ली है। जमाना बदल गया है, अब भैंस उसकी नहीं है जिसके पास लाठी है। लोकतंत्र हमें आश्वस्त करता है जंगल राज अब खत्म हो चुका है, अवशेष भले ही बाकी हों।
किन्तु प्रश्न यह बना रह जाता है कि क्या हमारी बहनों को व्यवस्था पूरी सुरक्षा दे पाई है!? बलात्कार की घटनाएं जिस तेजी से हो रही हैं वो आहत करने वाली है। मूल्यों का पतन इस हद तक हो गया है कि जिन पर बच्चियों की रक्षा का उत्तरदायित्व है वही अस्मत लूटने वाले साबित हो रहे हैं!! गैंग-रेप का समाचार हर दूसरे-तीसरे दिन की खबर बन रहा है! दिल्ली में गतवर्ष दामिनी के साथ घटित होने के बाद जनता ने तीव्र विरोध दर्ज कराया लेकिन कुछ हांसिल नहीं हुआ। खबर है कि अपराधों के चलते लड़कियां  दिल्ली में अपने को बहुत असुरक्षित समझ रही हैं, यहां तक कि कई ने नौकरी छोड़ कर अपने परिवार में लौट जाना बेहतर समझा। जिम्मेदार लोग भरोसा दे रहे हैं लेकिन कोई विश्वास नहीं कर पा रहा है। जिन्हें आदर्श होना चाहिए वो यौनशोषण के लिए सुर्खियों में दिखाई दे रहे हैं!! किसी के पास वो भरोसा नहीं है जो एक बहन को भाई से प्राप्त होता है। भरोसे की आस में नेता कभी मामा बनते हैं कभी भाई लेकिन मात्र औपचारिक हो कर रह जाते है, वाजिब असर नहीं होता है। बहन के लिए भाई का स्थान बहुत अहम् होता है, उसकी जगह कोई नहीं ले सकता है। और इसीलिए आज भी रक्षाबंधन का यह त्योहार अपना वास्तविक महत्व कायम रखे हुए है।
रक्षाबंधन के दिन ऐसी तमाम बहनें हैं जिनके भाई नहीं हैं, यानी जो माँ-बाप  की भाईविहीन संतानें हैं। कुछ ऐसी भी हैं जिनके भाई अब दुनिया में नहीं हैं। इनके लिए यह त्योहार दुःख और पीड़ा के साथ आता है। जिस समाज में भाई एक सहारा ही नहीं सुरक्षा देने वाला भी माना जाता हो वहां यह बहनें अपने को कितना अकेला और भीगा हुआ महसूस करती हैं, इसे समझना बहुत कठिन है। इसके विपरीत ऐसे भाई भी हैं जिनकी बहनें नहीं हैं या जो अब संसार से चली गई हैं, वे भी इस त्योहार को अंदर से पसीजते हुए देखते हैं। जब हम अपनी कलाइयों पर रंगबिरंगे रक्षासूत्र देखें तो उन तमाम बहनों और भाइयों को भी याद करें जो आज उदास मन से टीवी या किताब खोले अपने को बहला रहे होंगे। 

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