Wednesday, March 19, 2014

आखिर कौन है कार्यकर्ता !

             
  कहते हैं श्वान एक वफादार प्राणी है तो इस वाक्य में श्वान  के प्रति वफा से पैदा हुई वो इज्जत होती है जो अब शायद सब इंसानों या यों ही कहें कि राजनीति क्षेत्र के लोगों को नसीब नहीं है। सफाई में हमें यह भी सुनने को मिल सकता हैं कि "कुछ  तो मजबूरियां रही होंगी, यूं ही कोई बेवफा नहीं होता।" चाहे राजनीतिक ही क्यों न हो, विचारधारा एक संस्कार की तरह होती है, जो हवा के झोंकों के साथ बदलती नहीं रह सकती है, चाहे सही हो या गलत। संसार में पूर्ण सही या पूर्ण गलत को लेकर विद्वान माथाफोड़ी करते रहे हैं किन्तु नतीजा शून्य ही रहता आया है। ऐसे कई हैं जो स्वयं को दल के प्रति निष्ठावान घोषित करते चले आ रहे थे, अचानक उस ओर चल देते हैं जिसकी घोर निंदा करते रहे हैं। किस लिए भई !! आज ऐसा क्या हो गया आखिर कि विचारधारा ही बदल गई ! उस पर ताज्जुब यह कि वे अपने कार्यकर्ताओं के साथ दल बदलते हैं ! ये कार्यकर्ता कौन होते हैं ? क्या वे रोबोट की तरह होते हैं ? उनमें बुद्धि नहीं होती ! या फिर वे खरीदे गुलाम होते हैं ! वे सोचते विचारते नहीं हैं क्या ? दल से संबंधित संस्कार या विचारधारा का उनसे कोई नाता नहीं होता है!? कहने को ग्रासरूट पर कार्यकर्ता ही काम करता है, तो सवाल ये है कि वो स्वैच्छा से करता है या दल का दैनिक भुगतान वाला मजदूर है ? वो अपने नेता का बंधुवा मजदूर है ? यदि है तो उसमें और जमींदार के मजदूरों में कोई फर्क है ? मालिक ने निष्ठा बदली और सारा अमला दूसरी तरफ काम करने लगा !! लोकतंत्र के यज्ञ में कार्यकर्ता सबसे अहम इकाई है, तो वह कहीं भी हांकी जाने वाली भेड़ों की रेहड से अलग क्यों नहीं है, अगर नेता के प्रति कार्यकर्ता का निष्ठावान होना जरूरी है तो नेता के लिए निष्ठागत स्वतंत्रता क्यों ?  दलबदल के इस मौसम में मूर्ख बन रहा कार्यकर्ता जान रहा है कि उसका आका किसी सौदे के तहत बिक रहा है ! अगर उसका कोई ईमान नहीं है तो कार्यकर्ता उसके प्रति क्यों ईमानदार रहे ! अवसर छोटे ही सही, छोटों के पास भी आते हैं। बड़ा बड़े प्रस्ताव पर बिकता है तो छोटा छोटे प्रस्ताव पर क्यों नहीं बिके ! बड़ा अपनी बेईमानी को राजनीति कहता है तो छोटे के लिए यह अलग कैसे ? सच्चाई यह है कि कार्यकर्ता दो तरह का होता है। एक. जो अपने लिए राजनीति में जगह तलाश रहा हो। ऐसे लोग प्रायः संपन्न और प्रभावी प्रष्ठभूमि से आते हैं, इन्हें सत्ता की चाह होती है अपने धन की रक्षा और वृद्धि के लिए। दूसरे. वे होते हैं जो कटी पतंग की तरह होते हैं और उसके हो जाते हैं जो उनकी डोर पकड़ ले। एक मौका होता है भियाजी की नजरों में चढ़ने का। महीना.डेढ़ महीना भियाजी का काम कर लिया तो बाद में भिया थाने से छुडवाने, जमानत करवाने या पुलिस को फोन करने के काम आते रहेंगे। इन्हें मतलब नहीं कि भियाजी किस पत्तल में खा रहे हैं और किस में छेद करके उठे हैं। यह पूरी तरह से स्थानीय मामला है और पारस्परिक लेन.देन पर टिका हुआ है। तो सवाल वहीं का वहीं रह जाता है कि दलों के पास असली कार्यकर्ता कहां है ? यदि नहीं है तो क्यों नहीं है ? फिर दल  कैसा !? और किसका !?
                                                               -------

No comments:

Post a Comment