Tuesday, February 23, 2016

इतिहास के पन्नों पर आत्माओं का जिक्र !

            
पिछले जन्म में ईसाई रहा हो, आज मेरा शरीर हिंदू है, और अगली बार मुस्लिम के घर पैदा हुआ तो ! प्रश्न सामने आता है कि आस्थाएं शरीर की हैं या मेरी !? मैं शायद तब भी वही था जो इस जन्म में आज हूँ और आगे भी वही रहूँगा. आज जो शरीर हिंदू समर्थक है वो कल इसका विरुद्ध भी हो सकता है. गीता में कहा गया है कि जिस तरह हम वस्त्र बदलते हैं, आत्मा उसी तरह शरीर बदलती है. वस्त्र के साथ हम नहीं बदलते, इसी तरह शरीर बदलने से भी हम नहीं बदलते हैं. मुझे विश्वास है कि मैं वही हूँ, निरंतर वही. निष्ठाएं, मान्यताएं, पारस्परिक सम्बन्ध आदि सब मिले हुए शरीर के साथ हैं. यहाँ तक कि सुख-दुःख भी शरीर की अनुभूतियाँ हैं. शरीर से अलग होने का संज्ञान होने पर इन अनुभूतियों की प्रबलता कम हो जाती है. ऐसा मैंने अनेक बार अनुभव किया है. जब मैं अपने को भूल जाता हूँ तो शरीर हो जाता हूँ. तब शरीर की हर अनुभूति निर्बाध मुझ तक पहुंचती है. कई बार बुखार और अन्य शारीरिक पीडाओं के समय ऐसा लगता भी है. जीवन में अनेक उतर चढाव आते हैं, लेकिन वह सब शरीर और उसकी चेतना के हिस्से में आया भाग है. अनेक बार बड़े बूढों के मुंह से सुना है कि देह धरे का दंड है सो देह को भोगना ही पड़ेगा. और भोगती भी वही है.
शायद इसका कारण उम्र हो, अनचाहे ही इन दिनों बार बार यह प्रश्न कौंध रहा है कि मैं कौन हूँ. खासकर उस वक्त जब एकांत में होता हूँ.( उम्र के साथ एकांत के अवसर भी बढ़ रहे हैं ) कई बार यहाँ वहाँ पढा-सुना है कि हम वो नहीं हैं जिस पहचान के साथ अब तक जीते रहे हैं. भिन्न भूमिकाओं में हमारी भिन्न पहचान हैं पर वह पहचान शरीर की है, शरीर के साथ हैं. हालाँकि शरीर मेरा है और मैं उसका ध्यान भी रखता हूँ, उसे पसंद भी करता हूँ, उसमें अपनापन महसूस करता हूँ, ;लेकिन उससे आलग हूँ. जैसे एक बच्चा अपने खिलौने पर अपना स्वामित्व मानता है, उसे पसंद करता है, उसके साथ खेलता है. लेकिन उसका अस्तित्व खिलौने से अलग होता है. न वो खिलौने में है और न खिलौना उसमें है. 
 किन्तु ये भी तय है कि मुझे एक दिन अपना शरीर छोडना है जैसा कि हर किसी को छोडना है. उस शरीर को जिसने जाने अनजाने तमाम वो काम किये जिसमें मेरा सहयोग और सहमती नहीं थी. यानी मेरी इच्छा के विरुद्ध, कई बार मना करने के बाद भी. मैं बहुत सी बातों को नहीं मानता हूँ, लेकिन शरीर, जिस परिवार में, समाज में या जिस व्यवस्था में निरंतर बना हुआ है, समाज के सम्मान को रखने और स्वयं को बनाये रखने के लिए उसे बहुत कुछ ऊँचा-नीचा करना पड़ता है. मेरी सोच अलग है और बने रहने के लिए शरीर की जरुरत अलग. किसी बात पर मैं राजी भले ही नहीं हूँ पर शरीर को करना पड़ता है. दो अलग अलग इकाइयां हैं जो आपस में इस तरह से उलझी हुई हैं जिन्हें पृथक देखना कठिन है. शरीर को भूख लगती है तो वह मुझसे कुछ नहीं मांगता, व्यवस्था के अंतर्गत उसके जैसे दूसरे शरीर से मांगता है. मैं सब देखता हूँ किन्तु भौतिक जगत में मेरा हस्तक्षेप नहीं के बराबर है. फिर एक सवाल कि। ...... आप क्या हैं ? और क्यों हैं ?
आंगन में एक पिंजरा लटका है, उसमें  एक चिड़िया है. समझ में नहीं आता कि चिड़िया है इसलिए पिंजरा है या पिंजरा है इसलिए चिड़िया है ? लेकिन सच्चाई यह है कि पिंजरा और चिड़िया दोनों हैं. इनमें से एक भी नहीं हो तो दूसरा अप्रासंगिक हो जाये. पंछी है तो पिंजरे का अर्थ है और पिंजरा है तो पंछी है. मैं हूँ यह बात मुझे शरीर से जोड़ती है और जब जानना चाहता हूँ कि मैं कौन हूँ तो इसका सिरा अनंत की ओर मुड़ जाता है. वैज्ञानिक कहते हैं कि ब्रह्माण्ड में अनेक पृथ्वियाँ हैं, सैकड़ों की संख्या में. वहाँ जीवन है, म्रत्यु भी होगी ही. बहुत संभव है कि आत्माएं एक पृथ्वी से दूसरी पृथ्वी पर आती जाती रहती हों. फिर मेरा क्या है ? मेरे शरीर का क्या ? धन संपत्ति, नाते रिश्ते, लिया दिया, कुछ भी नहीं ! न विचार, न तर्क, न धर्म, न  वाद कोई. अगर इतना निरर्थक है जीवन, इतना  निष्प्रयोजन है शरीर, तो विचलन होता है. कृष्ण ने भी गीता में आत्मा की महिमा बताई है, शरीर को तो मरने-काटने और नष्ट करने योग्य, दूसरे शब्दों में अर्थहीन कहा है...... तब ?....... 
युद्ध तो शरीर को ही करना पड़ा. 
सुनिए, कोई कह रहा है ..... तुम आत्मा हो, आत्मा अमर होती है .... किन्तु इतिहास शरीर बनाते हैं, ... इतिहास  के पन्नों पर आत्माओं का जिक्र नहीं होता है .
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