Wednesday, May 25, 2016

पाप हैं कि धुलते ही नहीं !!


हाल ही में सिंहस्थ का एक माह तक चला मेला समाप्त हुआ है. खबर कि  है करोड़ों लोगों ने उज्जैन की पवित्र शिप्रा नदी में डुबकी लगाई और अपने अब तक किये पाप धोए. गीता में लिखा भी है कि काया वस्त्र कि तरह है जिसे आत्मा बदलती रहती है. यानी मृत्यु के बाद आत्मा नया शरीर ग्रहण कर लेती है. यह क्रम चलता रहता है जब तक कि मोक्ष न हो जाये. मोक्ष का सम्बन्ध कर्म फल से होता  है. मनुष्य जो करता है उसके हिसाब से पाप या पुण्य उसके खाते में जमा होते रहते हैं. रोजाना पूजा-पाठ, ब्रत-उपवास करते भक्त जन पाप का भार कम करते हैं और पुण्य का बढाते हैं. रहा-सहा पाप कुम्भ आदि में धो लिया जाता है. इस प्रकार आम भारतीय श्रद्धालु पूरी तरह पवित्र और अपने नित्य जीवन में सुख-शांति का अधिकारी भी है. यहाँ इस बस बात को नहीं भूलना है कि आस्थावानों में अधिक प्रतिशत गरीबों का है जो प्रायः अशिक्षित है, जिनके पास रहने-खाने कि समस्या है, जो शारीरिक रूप से इतने कमजोर और हीन हैं कि उनमें जीवन संघर्ष का उत्साह देखने को नहीं मिलता है. बीमारी की हालत में वे चिकित्सा की जगह चमत्कार की आशा करते हैं. इसीलिए बाबाओं के जाल में फंसते रहते हैं.
               अब सवाल यह है कि इतनी आस्था, इतनी भक्ति, इतनी श्रद्धा और विश्वास कि भगवान पत्थर का हो तो भी पिघल जाये तो यहाँ करोड़ों आस्थावान नारकीय जीवन क्यों जी रहे हैं ! कहते हैं कि पूर्व जन्म के पापों के कारण इस जन्म में आदमी को भुगतना पड़ता है ! तो फिर पूजा, परिक्रमा, स्नान, घ्यान आदि का क्या हुआ. अभी लेखक हरि जोशी कि एक किताब पढ़ी जिसमे उन्होंने अपने अमेरिका प्रवास के संस्मरण लिखे हैं. वहाँ का जीवन उन्मुक्त है. लोग पढ़े लिखे और परिश्रमी हैं, अच्छा खाते-पीते हैं और आमतौर पर सब सुखी हैं. हरि जोशी लिखते हैं कि आश्चर्य होता है कि यहाँ घर्मिकता उतनी नहीं है जितनी कि भारत में है, चर्च भी रोज नहीं जाते हैं, प्रार्थना में भी अधिक समय नहीं लगते हैं ! लेकिन आम अमेरिकी सुखी है, समृद्ध है, ऐसा क्यों आखिर !! इसपर सोचने कि जरुरत है.
             हर तीन वर्ष में कुम्भ का मेला होता है, हरिद्वार, नासिक, प्रयाग यानी इलाहबाद और उज्जैन में बारी बारी से. इसलिये एक स्थान का क्रम बारह वर्षों के बाद आता है. इनमें करोडो लोगों की भागीदारी होती है और सरकारें जनता के टेक्स का हजारों करोड़ रुपया इंतजाम में खर्च करतीं हैं. साल दो साल पहले से तैयारी में मानव श्रम लगाया जाता है. निसंदेह इसका लाभ भी होता है कि उस स्थान को कुछ नए निर्माण मिल जाते हैं, कुछ व्यवस्थाएं हो जाती हैं, लेकिन उनकी उम्र बहुत कम होती है और अगले कुम्भ तक वे बनी नहीं रहती हैं. इस तरह देश में प्रायः हर समय कहीं न कहीं कुम्भ मेले कि तैयारी चलती रहती है. इतना धन और मानव श्रम विकास की योजनाओं में लगे तो देश के लोग ज्यादा सुखी हो सकते हैं. सवाल सिर्फ आर्थिक नहीं है. इन मेलों से जनता को प्रेरणा किस बात की मिलती है !! भाग्यवादी और अकर्मण्य लोग अपने विश्वास को पकडे बैठे रहते हैं. साधू-संत उन्हें पाखंड के पाठ पढ़ा कर वापस सदियों पीछे धकेल देते हैं. समय के साथ कोई उन्हें बदलने की शिक्षा नहीं देता है. पिछले साठ वर्षों में बीस से अधिक कुम्भ हो चुके हैं, इस बीच दुनिया बदल चुकी है लेकिन हिंदू समाज की सामाजिक समस्याएं वहीं की वहीं हैं, बल्कि कुछ बढ़ी ही हैं. मै नहीं कहता कि कोई दिन ऐसा आएगा जब इस तरह के मेलों की प्रासंगिकता पर लोग प्रश्नचिन्ह लगाएंगे. जिन करोड़ों लोगों को सैकड़ों वर्षों से अंधविश्वासी बनाया जाता रहा हो, और अब सरकारें भी भक्त की तरह सहयोग में लगी पड़ी हो तो बदलाव की उम्मीद कम हो जाती है. लेकिन एक सवाल पर विचार करना ही चाहिए कि इस कवायद से हासिल क्या होता है. नई पीढ़ी से बहुत आशा है, इस तरह की बातों को शायद वही समझे.

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