Friday, January 8, 2010

* कहां है बेहतर आदमी !!

बेहतर आदमी की हमारी परिभाषा क्या हो सकती है ? इस समय जबकि शब्दकोष में दर्ज अर्थ और परिभाषाएं केवल किताबी मानी जा कर व्यवहार में नहीं हैं, बेहतर आदमी के लिये स्पष्ट चित्र बनाना कठिन है । यदि बेहतर जिन्दगी जीने वालों को हम बेहतर आदमी मान रहे हैं तो हमें निश्चित रूप से आंखें खोलने की जरूरत है । जिनके पास बड़ी डिग्रियां और ओहदे हैं उन्हें भी बेहतर आदमी मानना एक प्रकार की लापरवाही हो सकती है । कारण यह कि उपर से बेहतर दिखाई देने वाली इन बेहतर चीजों के पीछे प्रायः बेहतर आचरण नदारद होता है । यह सही है कि शिक्षित आदमी बेहतर जिन्दगी के लिये ही शिक्षा प्राप्त करता है । लेकिन उसकी बेहतर जिन्दगी की फ्रेम में कहीं भी बेहतर आचरण प्राथमिकता में नहीं होते हैं । बंगला, मोटर, जमीन की इच्छा शीघ्र ही बंगलों, मोटरों और जमीनों में तब्दील हो जाती है और बेहतर जिन्दगी एक अंधी रेस में बदल जाती है । तब बेहतर आचरण एक बाधा या रूकावट की तरह सामने आते हैं, जिन्हें अनचाहे गर्भ की तरह निकाल का फैंक दिया जाता है । ऐसा ही सोचने और करने वाले दूसरे व्यक्ति इसे उचित ठहरा कर वर्ग विषेष की मान्यता प्रदान करते हैं । कहा जाता है कि सफलता को प्रमाण की आश्यकता नहीं होती है । जो सफल हैं वही सही है । तब सफल जीवन ही बेहतर जीवन कहा जाने लगता है, चाहे उसमें बेहतर आचरण न हो । लेकिन प्रश्न रह जाता है कि बेहतर आदमी कौन !? वह आदमी जिसके एक या कुछ आचरण बेहतर हैं या समग्र रूप में, स्वभाव व संस्कारों से भी उसे बेहतर होना चाहिये । यदृपि इसमें सापेक्षता दिखाई दे सकती है । एक जेबकतरे के लिये रिश्वत ले कर छोड़ देने वाला सिपाही बेहतर हो सकता है । एक चोर इसलिये बेहतर कहा जा सकता है कि वह एक बेसहारा बुढ़िया की मदद करता है । एक न्यायाधीश, वकील, डाक्टर या प्रोफेसर बेहतर आदमी हैं लेकिन तब जबकि वे बेसहारा बुढ़िया की मदद कर रहे होते हैं । लेकिन जब वे चोरी कर रहे हैं, बेशक यहां चोरी का तरीका अलग है, तब वे बेहतर आदमी कैसे कहे जा सकते हैं !? हाल के दिनों में न्यायाधीषों द्वारा लाखों रूपए रिष्वत लेने के मामले प्रकाष में आए हैं । उत्तर प्रदेष में बड़े अधिकारियों के यहां बिजली चोरी के काफी सारे प्रकरण उजागर हुए हैं । सत्तर प्रतिषत विधायक और मंत्री आयकर रिटर्न दाखिल नहीं करते हैं और न ही अपनी आय का कोई खुलासा देते हैं । आई. ए. एस. स्तर के अधिकारी अवैध संबंधों और हत्या के जुर्म में सलाखों के पीछे खड़े हैं !! गबन, घोटाले, ठगी, बेईमानी जैसे कर्मो की फेहरिस्त बनाइये, इनमें बेहतर आदमी बहुतायत में दिखाई देंगे । सामाजिक मूल्यों, संस्कारों, मान-मर्यादा का ख्याल रखने वालों, समाज से डर कर आत्मानुषासित रहने वालों में ज्यादातर सीधे-साधे, अपढ़, ग्रामीण आदमी ही दिखाई देंगे । यदि नेकी, ईमानदारी, दया, प्रेम, सच्चाई जैसे मूल्यों की सांसें अभी चल रही हैं तो इसका श्रेय उनको जाता है जिन्हें बेहतर आदमी कहे समझे जाने में कोताही बरती जाती है । षिक्षा हमारी समझ को बेहतर बनाती है या यों कहना ठीक होगा कि षातीर बनाती है । लेकिन बेहतर आदमी अपने संपूर्ण बेहतर आचरण से बनता है । तो फिर वो क्या है जो आदमी के आचरण को बेहतर बनाती है !? - जवाहर चौधरी , 16 कौशल्यापुरी, चितावद रोड़, इन्दौर - 452001 फोन - 98263 61533 , 0731-2401670

3 comments:

  1. जिनके पास बड़ी डिग्रियां और ओहदे हैं उन्हें भी बेहतर आदमी मानना एक प्रकार की लापरवाही हो सकती है । कारण यह कि उपर से बेहतर दिखाई देने वाली इन बेहतर चीजों के पीछे प्रायः बेहतर आचरण नदारद होता है ।

    बिल्कुल सही नज़रिया है।

    स्वागत जवाहर भाई।

    ReplyDelete
  2. प्रदीप भाई और सुमनजी,
    आप दोनों का शुक्रिया ।

    ReplyDelete