Wednesday, January 13, 2010

* आंखें मत खेलिये, बाजार का दैत्य नाच रहा है !

हम क्या पसंद करेंगे, क्या खाएंगे, क्या पहनेंगे, हमारे बच्चे किस विशय को पढ़ेंगे, कैसी नौकरी करेंगे , किस देश में करेंगे, महिलाएं कितना और कैसा परिधान ‘धारण’ करेंगी , हमारा घर कैसा होगा, हमारी जीवनशैली कैसी होगी, कौन से उपकरण हमारे लिये बहुत जरुरी हैं, किन चीजों से हमारा जीवन मनुष्य का जीवन कहलाएगा यह सब हम नहीं बाजार तय करता है । आर्थिक ताकतें हमें सुझाव देती हैं , हमारे आगे विकल्प रखतीं हैं और अंततः हमें वही चुनने में ‘मदद’ /?/ करती हैं जिसमें उनका फायदा हो । उस विज्ञापन को याद कीजिये जिसमें एक डाक्टर संतरे को सेहत और सुन्दरता के लिये बहुत जरुरी बताता है । अगले क्षण एक सुन्दरी संतरों को सड़क पर फेंकती नजर आती है । नेपथ्य से आवाज आती है - छोड़ दीजिये पुराना ढंग, नए अंदाज में लीजिये संतरे के गुण । अगले दृश्य में नारंगी रंग के तरल पदार्थ से भरी एक बोतल उभरती है , संगीत गूंजता है और उमंग ही उमंग , नौजवान, बच्चे - बूढ़े सब उछलते-कूदते खुश ! अंत में वही डाक्टर बोतल हाथ में लिये मुस्कराता नजर आता है । जिस तरह असली संतरों को फेंक देने का सुझाव आता है और नारंगी तरल पदार्थ को उससे श्रेष्ठ बताया जाता है उसी तरह अन्य असली चीजों को भी हमारे सामने से हटाया जा रहा है । ध्यान दें कि किस तरह से हमारा लिबास बदल गया है ! हमारी भाषा गुम होने लगी है ! और संस्कृति पर तो संकट कहर बन कर टूटा है । हमारे तीज-त्योहार बिलाते जा रहे हैं । जो चलन में हैं उनका भी सांस्कृतिक महत्व कम व्यावसायिक महत्व अधिक हो गया है । दिवाली - दशहरा जैसे त्योहार को लें तो पाएंगे कि इनमें परंपरा लगातार सिमटती जा रही है और बाजार द्वारा आरोपित आचरण प्रधान होते जा रहे हैं ।शैक्षणिक संस्थाओं से कला और समाजविज्ञान के जरुरी विषय लगातार समाप्त हो रहे हैं क्योंकि बाजार में इनकी मांग नहीं है । बच्चों को इंजीनिरिंग और मेनेजमेंट में जबरन झौंका जा रहा है । मां-बाप समझते हैं कि निर्णय वे ले रहे हैं, जबकि निर्णय बाजार करता है । कानून ने विवाह की आयु 18-21 तय की है लेकिन बाजार ने इसे तीस-प्लस कर दिया है । लोगों को भ्रम है कि वे अपने निर्णय से विवाह और बच्चे पैदा कर रहे हैं ! सब बहुत खामोशी से हो रहा है । चिंता की बात यह है कि यही प्रवृत्ति रही तो नकली यानी बुरे व अमानक आचरण समाज में स्वीकृत होते जाएंगे । जिस तरह भ्रष्टाचार होता जा रहा है, बल्कि यों कहना ज्यादा ठीक होगा कि हो गया है । हर कोई भ्रष्टाचार की निंदा करता है लेकिन इसे ‘शिष्टाचार’ का नाम किसने दिया ? ‘लेन-देन’ को एक अचूक तरीका किसने बनाया ? साफसुथरे आदमी को भ्रष्ट करने वाली व्यवस्था का पोषण कहां से हो रहा है ? कर चोरी या बिजली चोरी जैसे कामों को क्यों सामान्य समझा जाने लगा है !? क्या इसलिये नहीं कि इसमें प्रायः बाजार के श्रेष्ठी लिप्त होते हैं !?

2 comments:

  1. आर्थिक ताकतें हमें सुझाव देती हैं , हमारे आगे विकल्प रखतीं हैं और अंततः हमें वही चुनने में ‘मदद’ करती हैं जिसमें उनका फायदा हो । बिलकुल सही कहा जवाहर भाई। ब्लॉग की दुनिया में आपका स्वागत है।

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  2. धन्यवाद आदित्य जी ।

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