Saturday, January 16, 2010

* समय बजा रहा है मृत्यु घंटी !!

जनसंख्या वृद्धि को लेकर भारत जितने संकट में है उसकी तुलना में हमारी चिंता और चेतना के दर्शन नहीं हो रहे हैं । जनसंख्या विस्फोट के खतरों को भांप कर परिवार नियोजन कार्यक्रम पर जोर यदृपि बहुत उचित था किन्तु 1977 के आम चुनाव में भारी उलट-फेर के बाद आजतक राजनीतिक दल परिवार नियोजन को दूर से ही छूते नजर आते हैं । हाॅलांकि उस समय सालाना करीब एक करोड़ बच्चे पैदा हो रहे थे और जनसंख्या 1971 की जनगणना के अनुसार करीब 55 करोड़ थी । अब शिक्षा , करियर जैसे अनेक स्वस्फूर्त कारणों से जन्मदर गिरने के बावजूद हर साल एक करोड़ सत्तर लाख से अधिक बच्चे पैदा हो रहे हैं और जनसंख्या 112 करोड़ से अधिक है ! जहां तक भूभाग का सवाल है, भौगोलिक सीमाएं तो वही हैं किन्तु पैंतीस साल की जनसंख्या वृद्धि ने हमारी उपजाउ धरती को आवास में उपयोग कर इसे बहुत घटा दिया है । पिछली जनगणना में /1991-2001/ देश की जनसंख्या में 21 .34 प्रतिशत औसत वृद्धि दर्ज हुई थी ।/धर्म के हिसाब से - हिन्दू 20 प्रतिशत, मुस्लिम 29.3 प्रतिशत , ईसाई 22 .1, बौद्ध 23.2 और जैन 26 प्रतिशत बढ़े / । इस दौरान प्रतिमिनिट 33 बच्चों की पैदाइश के साथ देश एक सौ बारह करोड़ की ‘‘स्लम-कंट्र्ी’’ बन गया है, जबकि मृत्यु दर ग्यारह व्यक्ति प्रति हजार रही । आने वाले समय में रोके जाने के बावजूद जनसंख्या विस्फोटक होगी क्योंकि हमारी 35 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या चैदह वर्ष से कम उम्र की है । शीघ्र ही इन्हें उत्पाद आयु हाॅसिल होगी और ये जनसंख्या वृद्धि के नए वाहक बनेंगे । जबकि 15 से 58 वर्ष की उत्पादक आयु वाले 57 प्रतिशत लोग पहले से ही सक्रिय रहेंगे ही ।
चीन आज दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाले देश होने का कलंक ढ़ो रहा है, लेकिन बहुत जल्द उसको इससे मुक्ति मिलने वाली है । भारत की औसत वृद्धि-दर 1.5 है जबकि चीन की मात्र .6 !! इसके चलते सन् 2050 भारत की जनसंख्या 162 करोड़ और चीन की 147 करोड़ होगी । यूनाइटेड नेशन की एक अंर्राष्ट्र्ीय रिपोर्ट के अनुसार 2030 में भारत चीन से आगे होना आरंभ कर देगा और 2035 में आगे निकल चुकेगा । यहां चीन से प्रतिस्पर्धा की नहीं, अनुकरण की बात है । यदि चीन हमसे बहुत अधिक जमीन होने के बावजूद जनसंख्या नियंत्रण में सफल है तो भारत में यह क्यों संभव नहीं हो रहा है ! यदि स्वास्थ्य सेवाएं प्राप्त करना नागरिकों का अधिकार है तो जन्म नियंत्रण उनका दायित्व क्यों नहीं है ! ?

राजनैतिक भय के चलते शुतुरमुर्ग-सरकारें यदि कठोर कदमों का साहस नहीं जुटा पा रहीं हैं तो परिवार नियोजन के लिये एक राष्ट्र्ीय स्वतंत्र विभाग स्थापित किया जाना चाहिये , जिसका सरकारों , पार्टियों , दलों या विचारधाराओं से कोई लेना-देना न हो । लक्ष्य प्राप्ति के लिये विभाग के पास संसद से अनुमोदित स्वायत्ता के अलावा हमारी जनसंख्यानीति , संविधान और पर्याप्त बजट व बल होना चाहिये । यह विभाग राष्ट्र्ीय-अंतर्राष्ट्र्ीय जनसंख्या विभागों से संपर्क में रहते हुए लक्ष्य प्राप्ति के लिये हर संभव प्रयत्न करे । समय मृत्यु-धंटी बजा रहा है । हमें उसकी आवाज को सुनना होगा । हरित क्रांति और श्वेत क्रांति की तरह अब ‘परिवार नियोजन क्रांति’ हमारे अस्तित्व के लिये अनिवार्य है ।

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