Sunday, January 24, 2010

* उदार नेतृत्व को मौका दें मुसलमान

इस समय देश का जनमानस एक गंभीर आत्ममंथन के दौर से गुजर रहा है । राजनीतिक शक्तियां अपने समीकरण और गणित शोध रही हैं । दल चाहे बयान कुछ भी दें, घर्मसंकट महसूस कर रहे हैं । मीडिया, जिसका प्रभाव आज सबसे ज्यादा है, कचोरी-समोसे की दुकान हो गया लगता है, माल गरमा-गरम हो तभी बिकता है । चैनल समाचार नहीं सुनाते फेरी वालों की तरह हांक लगाते हैं । सबसे पहले समाचार देने की होड में न केवल वे संवेदनहीन सिद्व हो रहे हैं बल्कि कई बार तो वे तथ्यों को तोड़ते-मरोड़ते, चिंगारी को आग में बदलने की नादानी करते प्रतीत होते हैं । आम आदमी बेबस और प्रबुद्वजन खीझते दिखाई देते हैं ।

न चाहते हुए भी बात हमें धर्म और संप्रदायों के संदर्भं में करना पड़ेगी । इसमें कोई संदेह नहीं कि भारत का मुसलमान दुनिया के अन्य मुसलमानों से भिन्न है । इसके कारणों में इतिहास, संस्कृति और परिवेश हैं जिनके विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है । यह सच्चाई है कि मुसलमानों में शिक्षा का प्रतिशत अन्य समुदायों की तुलना में बहुत कम है । लेकिन जितने लोग शिक्षित हैं वे नाकाफी नहीं हैं । हिन्दुओं की तरह इनमें भी उदार और प्रगतिशील विचारों वाले शिक्षित उपेक्षा के शिकार हैं । चंद कट्टरवादी अपने स्वार्थ के लिये , मुस्लिम समुदाय को भय दिखा कर लामबंद किये रहते हैं । ऐसा करने के लिये वे प्रायः विवादास्पद बयान देते हैं । जिसका परिणाम यह हुआ है कि हिन्दू कट्टर मानसिकता जन्म लेती है और फैलती है ।

भारत उससे अलग हुए दो भूखण्ड़ों से लगा हुआ है जो न केवल अपने को इस्लामिक राष्ट्र घोषित किये हैं अपितु उनकी गतिविधियां भी भारत विरोधी है । सब जानते हैं कि पाकिस्तान और बांगलादेश दोनों ही जगहों पर अल्पसंख्यक हिन्दुओं की स्थिति अच्छी नहीं है । वहां अनेक मंदिर व पूजास्थल हस्तगत कर व्यावसायिक उपयोग में लिये जा रहे हैं । भारत में जब भी सांप्रदायिक तनाव होता है वहां के पूजास्थल संकट में पड़ जाते हैं । कई बार तो प्रशासन के नियंत्रण में तोड़-फोड़ हुई है । तात्पर्य यह कि भारत के पडौसी देश आतंकवाद के जरिये भारत विरोधी गतिविधियां संचालित करते हैं हुए हिन्दू विरोधी भी हो जाते हैं । भारत में भले ही हिन्दुत्व और भारतीयता को एक मानने में कठिनाई महसूस की जा रही हो किन्तु हमारे पड़ौसियों ने इसे एक ही मान लिया है । भारतीय मुसलमान, जिनमें से अधिसंख्य हिन्दू धर्म की जातिवादी कू्ररता के कारण धर्मान्तरण कर गए हैं, इस हिन्दू विरोधी अवधारणा से बहुत आसानी से उनके पक्ष में हो जाते हैं । यह ध्यान रखने वाली बात है कि भारत का मुसलमान जातिशोषण की पीड़ा के कारण बहुत स्वाभाविक रूप से हिन्दुओं का विरोधी होगा , यह बात हिन्दुओं को अभी भी समझ में नहीं आई है । यदि हिन्दुओं को अपनी ऐतिहासिक अमानवीय त्रुटियों का कोई मलाल नहीं है, वे सुधार की मुद्रा या मंशा नहीं रखना चाहते हैं तो यह क्यों नहीं माना जाना चाहिये कि वे हाथ से निकल गए दासों-दलितों पर अब भी दांत पीस रहे हैं !! देवता हाथ में जूता लिये बैठे हैं और चाहते हैं कि दलित चरणों में लोटें, लेकिन कुछ छिटक कर मुसलमान हो गए ! और बात बे बात आंखें दिखाते हैं !! हजारों साल से सामाजिक सत्ता का सुख भोग रहे श्रेष्ठीजनों को यह कैसे रास आ सकता है । बावजूद इसके वे अपनी धार्मिक जटिलताओं में इस तरह जकड़े हैं कि उन्होंने आज तक हिन्दूधर्म में पुनः प्रवेश का कोई सर्वमान्य विधान तय नहीं किया है !!

इधर मुसलमानों का दुर्भाग्य है कि ऐसा नेतृत्व नहीं मिला जो उन्हें हिन्दू विरोधी मनोविज्ञान से बाहर निकाल कर उनमें राष्ट्र्वादी मानसिकता का विकास कर सके । इसलिये बुखारी जैसों की बन आती है और वे राख में दबी आग को हवा देने का मौका पा जाते हैं । यदि जिन्हा, शाहबुद्धीन और बुखारी जैसे लोग नहीं होते तो ठाकरे, सिंघल और तोगडिया भी नहीं होते । भारत के मुसलमानों को अब यह समझ लेना चाहिये कि उनके उग्र नेतृत्व की प्रतिक्रिया में पैदा हुआ कट्टर हिन्दूत्व आम हिन्दू के लिये भी एक समस्या बना हुआ है । आम हिन्दू की नाराजी इस्लाम से नहीं , मुसलमानों की इस चूक से अधिक है कि उन्होंने गलत नेतृत्व चुना । हिन्दू प्रायः शांतिप्रिय और उदार होता है । यही वजह है कि कट्टर हिन्दू की जितनी अलोचना आम हिन्दू कर रहा है उतना किसी और के लिये संभव नहीं है । स्वयं कट्टरवादी हिन्दू भी यह जानते और कहते हैं कि मुसलमान हमारी उतनी बड़ी समस्या नहीं हैं जितने कि प्रगतिशील हिन्दू । शिक्षित और मध्यवर्गीय समाज ने हिन्दुओं के कट्टरवाद को नकार दिया है । यही वजह है कि गुजरात के परिणाम अन्य कहीं भी दोहराए जा सकेंगे इस पर किसी को विश्वास नहीं है । इस प्रकार सामाजिक स्तर पर मुसलमानों को हिन्दुओं से उस तरह का खतरा नहीं ही है जैसा कि उनके नेता उन्हें बताते हैं ।

अब आवश्यकता इस बात की है कि मुसलमानों में ऐसे लोग आगे आएं जो उन्हें काल्पनिक भय और थोपी गई कट्टरता से बाहर निकालें । ऐसा नेतृत्व विकसित हो जो राष्ट्रीय विकास के मुद्दों पर मुसलमानों को भागीदार बनाए । जब किसी उपलब्धि की घोषणा हो तो वे भी अन्य लोगों के समान प्रसन्न हों , खुशी व्यक्त करें । ऐसा करते हुए एक संदेह, जो कि अभी व्यापक है, दूर होगा और वे हिन्दू समाज के अधिक निकट पहुंचेंगे , दूसरी ओर कट्टरपंथियों द्वारा फैलाए गए भ्रम का भी खण्डन होगा ।

हमारे राजनैतिक दल कितने धर्मनिरपेक्ष हैं इस पर बहस हो सकती है लेकिन स्वंय् हिन्दू-मुस्लिम समाजों को एक दूसरे के प्रति सहिष्णु होना होगा इसमें कोई संदेह नहीं है । इसका उपाय यह हो सकता है कि उदारवादी शिक्षित व प्रगतिशील मुस्लिम नेतृत्व आगे आए और हिन्दुओं की उदारता व सहिष्णुतता का सम्मान करे व मुस्लिम समाज में जन जन तक यही भावना पहुंचाए । प्रगतिशील हिन्दुओं को इससे बल मिलेगा, उनकी शक्ति दूनी होगी और दोनों समाजों को निकट लाने में अपेक्षाकृत अधिक सफल होंगे । यदि इस तरह की पहल हो पाती है तो विद्वानों, साहित्यकरों, समाजशास्त्रियों, कलाकारों आदि के गैर राजनीतिक संगठन भी सक्रिय किये जा सकते हैं ।

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